'स नैव रेमे ,
स द्वितीयमैच्छतम '-- .
वह ब्रह्म भी व्यक्त नहीं होपाता ,
जब तक उसे व्यक्त नहीं करती है -
स्वयं उसी की माया ।
वह वैश्वानर -विश्व, कहाँ हो पाता है व्यक्त,
जब तक नहीं होती है उसपर -
प्रकृति माया की छाया ।
वह सत्य तभी होता है व्यक्त 'सत्य '-
जब उसके सम्मुख आती है असत्य माया ।
वह जीव नहीं होपाता है व्यक्त न मुक्त,
जब तक नहीं उसको बिम्बित करती है,
स्वयं में जगन्माया ।
पुरुष कब होपाता है पूर्ण-
जब तक साथ न हो -
स्त्री, सखि, पत्नी, कामिनी, नारी का ,
ममता-माया रूपी साया ।।
