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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

पूर्णता ..... कविता...डा श्याम गुप्त ...

'स नैव रेमे , 
स द्वितीयमैच्छतम '--          .

वह ब्रह्म भी व्यक्त नहीं होपाता ,
जब तक उसे व्यक्त नहीं करती है -
स्वयं उसी की माया  ।

वह वैश्वानर -विश्व, कहाँ हो पाता है व्यक्त,
जब तक नहीं होती है उसपर -
प्रकृति माया की छाया ।

वह सत्य तभी होता है व्यक्त 'सत्य '-
जब उसके सम्मुख आती है असत्य माया ।

वह जीव नहीं होपाता है व्यक्त न मुक्त,
जब तक नहीं उसको  बिम्बित करती है,
स्वयं में जगन्माया ।

 पुरुष कब होपाता है पूर्ण-
जब तक साथ न हो -
स्त्री, सखि, पत्नी, कामिनी, नारी का ,
ममता-माया रूपी साया ।।