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सोमवार, 16 जनवरी 2012

अन्नपूर्णा--- कविता...डा श्याम गुप्त

भोजन ब्रह्म है,
और जीव -
हज़ार मुखों से ग्रहण करने वाला-
वैश्वानर है, जगत है |
और हज़ार हाथों से बांटने वाली,
अन्नपूर्णा-
माया है उसी ब्रह्म की |

हाँ, ऐसा ही लगता है, जब तुम-
तवा चकला चूल्हा,
रोटी कलछा और कुकर पर,
एक ही समय में ध्यान देलेती हो |

और, मुन्ना मुन्नी पापा व अन्य को,
परोस भी देती हो, एक साथ-
गरमा-गर्म, सुस्वादु भोजन |
जैसे  अन्नपूर्णा ,
हज़ार हाथों से .
सारे विश्व को तृप्त कर रही हो |

या कोई ज्ञान - रूपा,
हज़ार भावों से,
वैश्वानर को,
चराचर को,
ब्रह्म का -
रसास्वादन करा रही हो ||