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सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

भूल न जाना रे ..रे मनुवा मेरे . .. डा श्याम गुप्त

रे मनुवा मेरे . ss  ss ..रे मनुवा मेरे..ss  ss ....रे मनुवा मेरे ...s  s    s     s.......|
भूल न जाना रे ....ss ........भूल न जाना रे ...ss ....|

माया बिनु कब कौन चला है रे s s s s s..
माया बिनु कब जग चलता है रे   ss  ss  |
पर हरि  साथ नहीं होंगे तो,
माया नाच नचाये रे ....ss   ss   | ...रे मनुवा मेरे .....||

बिनु हरि  माया काम न आये,
शक्ति-अहं में तू भरमाये |
धन-सत्ता और सुरा-सुन्दरी ,
में रम जाए रे .....
तू रम जाये रे ......|      ...        ..... रे मनुवा मेरे ....||

माया प्रकृति शक्ति ही यथा-
नारी रूप सजाया |
अंतरमन से जान जो चाहे ,
जीवन की सुख छाया |

उस प्रभु का कर धन्यवाद ,
यह सुन्दर सृष्टि रचाई |
बाह्य रूप छूने-पाने की -
इच्छा, पाप कमाई |

साक्षी-भाव रहे जो मन, नहिं -
बाह्य रूप  ललचाये |
दृष्टा-भाव उसे पूजे, मन-
नहीं वासना आये |

पाप-कर्म नहिं  भाये ,
अनुचित कर्म न भाये |

भूल न जाना रे ....ss ...ss...भूल न जाना रे ...
रे मनुवा मेरे...ss . रे मनुवा  ssss,,,मेरे .......रे मनुवा..ss .. मेरे ...sssss..||

सोमवार, 16 जनवरी 2012

अन्नपूर्णा--- कविता...डा श्याम गुप्त

भोजन ब्रह्म है,
और जीव -
हज़ार मुखों से ग्रहण करने वाला-
वैश्वानर है, जगत है |
और हज़ार हाथों से बांटने वाली,
अन्नपूर्णा-
माया है उसी ब्रह्म की |

हाँ, ऐसा ही लगता है, जब तुम-
तवा चकला चूल्हा,
रोटी कलछा और कुकर पर,
एक ही समय में ध्यान देलेती हो |

और, मुन्ना मुन्नी पापा व अन्य को,
परोस भी देती हो, एक साथ-
गरमा-गर्म, सुस्वादु भोजन |
जैसे  अन्नपूर्णा ,
हज़ार हाथों से .
सारे विश्व को तृप्त कर रही हो |

या कोई ज्ञान - रूपा,
हज़ार भावों से,
वैश्वानर को,
चराचर को,
ब्रह्म का -
रसास्वादन करा रही हो ||