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शनिवार, 16 नवंबर 2013

गीत सज़े - डा श्याम गुप्त का गीत....



               गीत सज़े ---
में लगा सोचने गीत कोई लिखूं,
ख्याल बनकर तुम मन में समाने लगे।
तुम लिखो गीत जीवन के सन्सार के ,
गीत मेरे लिखो यूं बताने लगे ।

जब उठाकर कलम गीत लिखने चला,
कल्पना बन के तुम मुस्कुराते रहे ।
लेखनी यूंही कागज़ पे चलती रही ,
यूं ही लिखता रहा तुम लिखाते रहे ।

छंद रस रागिनी स्वर पढे ही नहीं ,
कैसे गीतों को सुर ताल ओ लय मिले।
में चलाता रहा बस यूं ही लेखनी ,
ताल लय उनमें तुम ही सज़ाते रहे ।

गीत मैंने भला कोई गाया ही कब,
स्वर की दुनिया से कब मेरा नाता रहा।
बन के वीणा के स्वर कन्ठ में तुम बसे,
स्वर सज़ाने लगे , गुनु गुनाने लगे ।

ख्याल बनके यूं मन में समाने लगे,
गीत मेरे लिखो यूं सुझाने लगे।।

शनिवार, 14 जुलाई 2012

तुम्हारे बिना ..कविता....डा श्याम गुप्त

प्रिये!
सूरज की महत्ता , भादों में-
धूप का अकाल पडने पर,
सामने आती है |
इसीतरह
तुम्हारे  बिना आज-
मन का कोना कोना गीला है ;
जैसे बरसात में ,
सूरज के बिना,
कपडे गीले रह जाते हैं

वस्तु की महत्ता का बोध, उसकी-
अनुपस्थिति से बढ़ जाता है |
इसीलिये तुम्हारी अनुपस्थिति में ,
हर बार-
तुम्हारे आकर्षण का ,
एक नया आयाम मिल जाता है |

लहरों  और कूलों के आपसी सम्बन्ध में ,
अणु  कणों के आतंरिक द्वंद्व में ,
सर्वत्र संयोग और वियोग का क्रंदन है |

संयोग और वियोग,
वियोग और संयोग ,
सभी में इसी का स्पंदन है,
यही जीवन है ||





बुधवार, 7 दिसंबर 2011

तुम्हारे बिना .....कविता ......डा श्याम गुप्त

                        हर नारी व्यक्तित्व महत्वपूर्ण है और प्रभावित करती  है, जब तक घर की नारी प्रभावित नहीं करती क्या लाभ....  charity begins from home........


प्रिये ! 
सूरज की महत्ता, भादों में-                   
धूप का अकाल पड़ने पर 
सामने आती है |
इसी तरह-
तुम्हारे बिना, आज-
मन का कोना कोना गीला है ;
जैसे बरसात में,
सूरज के बिना,
कपडे गीले रह जाते हैं |

वस्तु की महत्ता का बोध, उसकी-
अनुपस्थिति से बढ़ जाता है |
इसीलिये तुम्हारी अनुपस्थिति में ,
हर बार-
तुम्हारे आकर्षण का ,
एक नया आयाम मिल जाता है |

लहरों और कूलों के आपसी सम्बन्ध में ,
अणु-कणों के आतंरिक द्वंद्व में ,
सर्वत्र संयोग व वियोग का क्रंदन है |

संयोग और वियोग,
वियोग और संयोग,
सभी में इसी का स्पंदन  है,
यही जीवन है ||