बुधवार, 25 मई 2016

ना जाने क्या हुआ

ना जाने क्या हुआ🍃🐾🐾🐾🐾🐾

सबकी प्यारी सबकी दुलारी,कल तक तो मैं एक बेटी थी
आज न जाने क्या हुआ,मैं बहु बनना सीख गई
हर गलती मेरी सच्ची थी,कल तक तो मैं एक बच्ची थी
आज न जाने क्या हुआ, मैं बड़ी बनना सीख गई
कल तक तो देर तक सोती थी,माँ उठती थी तो लड़ती थी
आज न जाने क्या हुआ खुद ही जल्दी उठना सीख गई
कल तक तो माँ आती थी हाथों से दूध पिलाती थी
आज न जाने क्या हुआ मैं सबको चाय पिलाना सीख गई
कल तक मैं उनकी जिम्मेदारी थी अब सब मेरी जिम्मेदारी है
आज न जाने क्या हुआ,मैं हर जिम्मेदारी निभाना सीख गई
कल तक तो मैं जिद करती थी,दीदी भैया से लड़ती थी
आज जिदों को भूल कर ननद देवर को मनाना सीख गई
कल तक तो माँ के खाने में मैं नखरे करती रहती थी
आज न जाने क्या हुआ मैं सबके नखरे उठाना सीख गई
पापा की जरा सी डाँट पर कल तक जो रूठ जाती थी
आज न जाने क्या हुआ रूठों को मनाना सीख गई
सीखते सीखते भूल गई बेटी से बहु कब हो गई
कल तक जो इतनी छोटी थी आज इतनी बड़ी कब हो गई
@डॅा नीलम महेंद्र

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (27-05-2016) को "कहाँ गये मन के कोमल भाव" (चर्चा अंक-2355) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

shubham sharma ने कहा…

नीलम जी, आपकी इस रचना के लिए सर्वप्रथम इस रचना के लिए आपको बधाई....आपने बड़ी ही सुन्दरता के साथ बेटी और बहू के बीच का फासला और बेटी के कर्त्तव्य और शादी के पश्चात बहू के कर्त्तव्य को दर्शया है....ऐसी ही आशापूर्ण रचना अब आप शब्दनगरी पर भी प्रकाशित कर सकतें है...और अन्य लेखकों कि रचनाओं का आनंद प्राप्त कर सकतें हैं....