बुधवार, 1 जून 2016

किन्तु नारि पे नारि, स्वयं ही पड़ती भारी-

नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज । 
है घातक हथियार से, नारि सुशोभित आज ।

नारि सुशोभित आज, सुरक्षा करना जाने । 
रविकर पुरुष समाज, नहीं जाए उकसाने ।

किन्तु नारि पे नारि, स्वयं ही पड़ती भारी | 
पहली ढाती जुल्म, तड़पती दूजी नारी ।|

2 टिप्‍पणियां:

ऋता शेखर मधु ने कहा…

थोडा सा सच !

ऋता शेखर मधु ने कहा…

थोडा सा सच !