बुधवार, 30 जुलाई 2014

पत्रिका में ‘भारतीय नारी’26 JUL, 2014

3 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति

कविता रावत ने कहा…

बहुत बढ़िया
हार्दिक बधाई!

shyam Gupta ने कहा…

सच लिखा है वस्तुस्थिति यही है ...परन्तु नारियां स्वयं सोचें कि पुरुष या समाज या बच्चों को अनुशासन व संस्कार देना किसका कर्त्तव्य है ताकि वे नारियों का सम्मान करना सीखें ......
---- नारियां यह सोचना ही नहीं चाहतीं कि आज हर बात में घर से बाहर निकल कर , पुरुषों की बराबरी करके उन्हें क्या प्राप्त हुआ है व होगा ..यह उन्हीं के मंथन का विषय है --वे क्यों पुरुषों की बराबरी करना चाहती हैं ..वे तो स्वतः ही पुरुषों से संकल्प व सांस्कृतिक दृष्टि में स्स्दैव ऊपर रहीं हैं...परन्तु अपने स्वः के कर्तव्य वहन से ...क्या आज वे अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक कर्तव्य का वहन कर रहीं हैं ....

--- जो स्वयं अपने धर्म से गिर जाता है अत्याचार उसीपर होता है ....