मंगलवार, 15 सितंबर 2020

क्या लोकतांत्रिक सरकार की यही कार्यशैली है ?

 


महाराष्ट्र की राजनीति में इस वक्त भूचाल आया हुआ है।

जिस प्रकार से बीएमसी ने अवैध बताते हुए नोटिस देने के 24 घंटो के भीतर ही एक अभिनेत्री के दफ्तर पर बुलडोजर चलाया और अपने इस कारनामे के लिए कोर्ट में मुंह की भी खाई उससे राज्य सरकार के लिए भी एक असहज स्थिति उत्पन्न हो गई है। इससे बचने के लिए भले ही शिवसेना कहे कि यह बीएमसी का कार्यक्षेत्र है और सरकार का उससे कोई लेना देना नहीं है लेकिन उस दफ्तर को तोड़ने की टाइमिंग इस बयान में फिट नहीं बैठ रही। क्योंकि बीएमसी द्वारा इस कृत्य को ऐसे समय में अंजाम दिया गया है जब कुछ समय से उस अभिनेत्री और शिवसेना के एक नेता के बीच जुबानी जंग चल रही थी। लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पूरी मुंबई अवैध निर्माण अतिक्रमण और जर्जर इमारतों से त्रस्त है। अतिक्रमण की बात करें तो चाहे मुंबई के फुटपाथ हों चाहे पार्क कहाँ अतिक्रमण नहीं है? और जर्जर इमारतों की बात करें तो अभी लगभग दो महीने पहले ही मुंबई में दो जर्जर इमारतों के गिरने से कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और कितने ही घायल हो गए। बरसात के मौसम में मुंबई का डूबना तो अब खबर भी नहीं बनती लोग इसके आदि हो चुके हैं। फिर भी कोरोना काल और मानसून के इस मौसम में एक विशेष बिल्डिंग के निर्माण में कानून के पालन को निश्चित करने में बीएमसी की तत्परता ने पूरे देश को आकर्षित कर दिया।

दरअसल यहाँ बात एक अभिनेत्री की नहीं बल्कि बात इस देश के किसी भी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की है। बात किसी तथाकथित अवैध निर्माण को गिरा देने की नहीं है बल्कि बात तो सरकार की अपने देशवासियों के प्रति दायित्वों की है।

हमारे यहाँ कहा जाता है, प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितं।" अर्थात प्रजा के सुख में राजा का सुख है प्रजा के हित में राजा का हित है।

भारत एक ऐसा देश है जो सदियों ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा और  जिसकी पीढ़ियों ने इस आज़ादी के लिए संघर्ष किया। आज जब  उस आज़ाद देश में  एक ऐसा अपराधी जो मोस्ट वांटेड है उसकी प्रॉपर्टी सीना ताने खड़ी रहती है लेकिन एक टैक्सपेयर की बिल्डिंग तोड़ दी जाती है। जब कोर्ट द्वारा उस अपराधी की 80 साल पुरानी जर्जर एवं अवैध बिल्डिंग को नेस्तनाबूद करने के एक साल पुराने आदेश के बावजूद मानसून का हवाला देकर उसे हाथ तक नहीं लगाया जाता। जब  30 सितंबर तक कोरोना के चलते किसी भी तोड़ फोड़ पर  सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाई जाने के बावजूद एक महिला की बिल्डिंग पर बुलडोजर चला दिया जाता है। जब सरकार विरोधी रिपोर्टिंग करने के कारण कुछ पत्रकारों को जेल में डाल दिया जाता है।जब सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी कुछ सामग्री पोस्ट करने के कारण किसी दल विशेष के कार्यकर्ता एक पुर्व नौसेना अधिकारी पर हिंसक आक्रमण करते हैं। तो एक आम आदमी की नज़र में अभिव्यक्ति की आज़ादी, लोकतांत्रिक मूल्यों, संविधान के प्रति आस्था, न्यायालय के आदेशों का सम्मान जैसे शब्दों की नींव ही हिल जाती है। आज जब उस देश में एक महिला के लिए सत्तारूढ़ दल के एक नेता द्वारा  आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया जाता है तो जिन महिला अधिकारों महिला सशक्तिकरण महिला अस्मिता जैसे शब्दों का प्रयोग तथाकथित लिबरलस द्वारा किया जाता है उन शब्दों का खोखलापन उभर कर सामने आ जाता है।

राजनैतिक दृष्टि से भी महाराष्ट्र सरकार द्वारा उठाए जा रहे यह कदम अपरिपक्वता ही दर्शाते हैं। क्योंकि कंगना को भी पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता। जिस प्रकार की भाषा और जिन तेवरों का प्रयोग वो महाराष्ट्र और वहाँ की सरकार के लिए लगातार कर रही थीं वो निश्चित ही अपमानजनक थे। हो सकता है वो जानबूझकर किसी मकसद से ऐसा कर रही हों। लेकिन सत्ता में रहते हुए गुंडागर्दी करना किसी भी परिस्थिति में जायज नहीं ठहराए जा सकते।महाराष्ट्र सरकार की गलती यही रही कि वो कंगना की चाल में फंस गई और कंगना ने पब्लिक की सहानुभूति हासिल कर ली। जबकि महाराष्ट्र सरकार अगर राजनैतिक दूरदृष्टि और समझ रखती तो कंगना की इस राजनीति का जवाब राजनीति से देती अपशब्दों और हिंसा से नहीं। इस प्रकार की हरकतों से शिवसेना ने अपना कितना नुकसान किया है उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं है। कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाना, सुशांत केस में महाराष्ट्र पुलिस की कार्यशैली, और अब कंगना के बयानों पर हिंसक प्रतिक्रिया।

कहते हैं लोकतंत्र में जनभावनाओं को समझना ही जीत की कुंजी होती है लेकिन शिवसेना लगातार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। 1966 में बनी एक पार्टी जिसकी पहचान आजतक केवल एक क्षेत्रीय दल के रूप में है। वो पार्टी जो अपने ही गढ़ महाराष्ट्र में भी एक अल्पमत की सरकार चला रही है। ऐसी पार्टी जो आजतक महाराष्ट्र से बाहर अपनी जमीन नहीं खड़ी कर पाई। एक ऐसी पार्टी जिसकी लोकसभा में उपस्थित मात्र 3.3% है, अपनी इन हरकतों से कहीं महाराष्ट्र में भी अपनी बची कुची जमीन ना गंवा बैठे।

डॉ नीलम महेंद्र

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)

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शनिवार, 7 मार्च 2020

अंतरराष्ट्रीय दिवस बनाम शाहीन बाग......



कल इंंडिया टीवी पर अनायास ही शाहीन बाग दिख गया. अनायास यूँ कि आजकल समाचार चैनल , अखबार आदि विशेष स्थिति में ही देखती हूँ. फेसबूक के पत्रकारों की संगति में उसकी अधिक आवश्यकता भी नहीं होती क्योंकि यहाँ पक्ष / विपक्ष दोनों ही प्रभावी रूप से उपस्थित एवं मुखर भी हैं. अधिकांश वाट्सएप विडियो भी मैं देखे बिना ही डिलीट करती हूँ. स्मार्ट टीवी पर  यूट्यूब विडियो देखते हुए जब नेट कनेक्टिविटी बाधित होती है तब अपने आप टीवी चैनल पर सेट होने  के कारण ही अनायास दिख पड़ा समाचार चैनल.

तो आती हूँ मैं शाहीन बाग के समाचारों पर. अनूठा दृश्य था. दो लड़कियां रिपोर्टिँग कर रही थीं छिटपुट सी भीड़ में. रिपोर्टिंग करती लड़कियों ने उपस्थित स्त्रियों से बातचीत करनी चाही. उसने कम भीड़ का कारण पूछा तो एक का जवाब था कि हमारी हेड नहीं आई हैं. उनके आने के बाद हम इकट्ठी होती हैं.  दूसरी स्त्री से पूछा कि आपकी हेड कौन है तो जवाब आया हमारी कोई हेड नहीं है.अन्य स्त्रियों से बात करने पर वे जवाब दे ही रही थीं कि एक आदमी आया और उनमें से एक बुजुर्ग स्त्री के मुँह को उसकी चुन्नी से ढ़कने लगा चुप रहो के इशारे करते हुए. तभी हूटर बजने लगा और बहुत से युवक एकत्रित हो गये.  चुप रहो सब , कोई कुछ नहीं बोलेगा करते हुए अपने मुँह पर अँगुलियाँ रखते हुए चुप रहने का इशारा करते हुए. वहाँ उपस्थित सभी स्त्रियाँ अब चुप थीं. कोई जवाब नहीं दे रही थीं. कुछ दिन पहले ही किसी प्रबुद्ध स्त्री की वाल पर पढ़ा था कि अपने अधिकार के लिए जाग चुकी हैं, स्वतः प्रेरणा आदि आदि....
उन संवाददाता लड़कियों ने युवकों से कहा भी कि आप इन्हें बोलने क्यों नहीं दे रहे हैं. इस पर उपस्थित लड़कों की भीड़ की ताली बजा बजाकर चिढ़ाने जैसी आवाजें आती रहीं और उन आत्मनिर्भर साहसी लड़कियों की आवाजें - बदतमीजी न करें, कैमरे को हाथ न लगायें,  कैमरा क्यों बंद करवा रहे हैं आदि आदि....

वहाँ उपस्थित स्त्रियों के हुजूम में से कोई भी स्त्री उन युवकों को टोकते , उन लड़कियों के वहाँँ से सुरक्षित निकल जाने का कोई प्रयास करती दिखीं नहीं मुझे. हालांकि बैकग्राउंड में एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति की झलक अवश्य दिखी मुझे जो कुछ लड़कों को डाँट रहा था....

उसी समाचार के बीच में पुलिस फोर्स पर पत्थर बरसाती स्त्रियों का  विडियो भी दिखा. उसके अलावा भी यहीं फेसबूक पर भी बहुत तस्वीरें भरी पड़ी थीं हाथों में पत्थर लिये. इनमें से अधिकांश तो वही रही होंगी न जो कुछ समय पहले ट्रिपल तलाक के फैसले पर आजादी का जश्न मना रही थी.

अंतरराष्ट्रीय दिवस पर अधिकांश प्रबुद्ध स्त्रियों की वाल पर पढ़ने को मिलेगा- स्त्रियों की जात कुछ नहीं होती आदि आदि. और मैं सोच रही हूँ कि क्या वाकई ऐसा ही है....

फिर भी मैं अपने योगदान का उत्तरदायित्व वहन करते हुए सभी स्त्रियों को अंतरराष्ट्रीय स्त्री दिवस की ढ़ेरों शुभकामनाएं देती हूँ और प्रार्थना भी करती हूँ कि हम अपनी स्वतंत्रता को सही मायने में समझें और उसका रचनात्मक उपयोग करें....

http://vanigyan.blogspot.com/2020/03/blog-post.html
तुम्हारे और मेरे बीच की
दूरी में
पसरा हुआ ग़म
कब्ज़ा किये रहता है
मेरी
पनीली आँखों के
कोरों पर..
क्षीण होते हुये
मन के सामने
बिछा देता है
तुम्हारी यादों का
इंद्रजाल
कि .. उलझती रहूँ
उदासियों के दरवाज़े को
खोलकर
लगा देता है
सपनों के अंबार
कि.. विचरती रहूँ ..
पकड़कर
मेरी कलाइयों को
चलना सिखाने लगा है
तुम्हारे और मेरे बीच की
दूरी में
पसरा हुआ ग़म
मुझे
पहचानने लगा है ..