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सोमवार, 25 जुलाई 2011

अपनी-अपनी पसन्द

अपनी-अपनी पसन्द   

इस विषय पर कुछ भी कहना मेरे जैसे सत्तर साल पार कर चुके व्यक्ति के लिए शायद उचित न हो , क्योंकि आज की युवती ( आधुनिक ) का नज़रिया आज की परिस्थितियों को अपने  व्यक्तिगत तरीके से देखने का ही  रहता है , ऐसा  मेरा मानना है .

लेकिन , क्योंकि मुझे भी अपने विचार देने को कहा गया है तो जो मेरी समझ में आता है कहने का प्रयत्न करूंगा .

ये ठीक है कि  पुत्री का विवाह अपने से ऊंचे स्तर के परिवार में करना और पुत्र का अपने से नीचे के स्तर वाले परिवार में करने की परिपाटी आज भी हमारे समाज में बहुतायत से  प्रचलित है ,  क्योंकि इस व्यवस्था से समाज में आर्थिक एवं सामाजिक  दोनों  दृष्टि से   अच्छा सामंजस्य बना रहता है .

अगर हम रूढ़िवादी विचारधारा वाले परिवारों को छोड़ दें , जहां आज भी विवाह सम्बन्ध जोड़ने से पहले लड़कियों से उनके होने वाले पति के बारे में उनकी राय जानने की आवश्यकता ही नहीं समझी जाती , तो भी मध्यम वर्ग के परिवारों में आज भी  अधिकतर वही पुरातन मान्यताएं चली आ रही हैं .

परन्तु प्रश्न आज की युवती का है , जो पढ़ाई-लिखाई में तो किसी भी मायने में आज के युवक से कम है ही नहीं , धनोपार्जन की दृष्टि से भी पीछे नहीं है,तो क्या वो अपने से कम पढ़े-लिखे और कम रसूखदार युवक से शादी रचाना चाहेगी ?

लिखने को जितना चाहे अपनी भड़ांस निकालने के लिए लिखते जाएँ  , पर हकीकत ये है  कि आज की युवती अपने हिसाब से अपना वर चुनना पसन्द करती है . उस हिसाब में कम या ज़्यादा पढ़ा-लिखा होना या कम-ज़्यादा रसूखदार होना ही काफी नहीं है , इनके अतिरिक्त और भी बहुत सी बातें  हो सकती हैं जिन्हें वो देखना चाहती हो .

अपनी बात समाप्त करने से पहले  मैं अपने जानने वाले एक सज्जन की पुत्री का दृष्टान्त देना चाहता हूँ  , जिसे पूरे विस्तार से मैं अपने ब्लॉग '' दाने अनार के ''  में पहले से ही लिखने में जुटा हूँ ,  और जल्द प्रकाशित भी करूंगा .


यह लड़की बहुत पढ़ी-लिखी सुशील एवं सुन्दर युवती है ,  अपने  निम्न मध्यम वर्गीय माता-पिता की इकलौती सन्तान है और खूब अच्छा कमा भी रही है .


पहले तो ये लड़की अपने माता-पिता को पीछे  अकेला छोड़कर विवाह करने को ही तैयार नहीं थी , पर जब मानी तो सिर्फ अपनी शर्तों पर ही मानी .


आज वो पिछले कई बरसों से अपने बूढ़े माता-पिता के साथ उनके ही घर में अपने , फ्री-लांस जर्नलिस्ट , पति व अपने बच्चों सहित सुख पूर्वक रह रही है .
आप कहेंगे कि इसमें नया क्या है , घर जमाई रखने कि प्रथा तो बहुत पुरानी है .


तो यहाँ नया यह  है कि बच्चे अपने नाना के गोत्र को अपनाए हुए हैं ना कि अपने पिता के .यानि इन बच्चों से वंश परम्परा नाना की आगे बढ़ेगी ना कि पिता की .


इस लड़की का पति अपने भाइयों व अपने माता-पिता से अलग अपने सास-ससुर के पास रह कर उनकी सेवा में लगा हुआ है ना कि अपने माता-पिता की  .


इस लड़की ने शादी की तो अपनी पसन्द के विद्वान् , स्वस्थ और संस्कारवान किन्तु गरीब घर के एक युवक से पर  शादी की भी तो केवल अपनी शर्तों पर .


आज सब सुखी भी हैं .


मेरा आशय केवल यह है कि आज की आधुनिक युवती गरीब गाय नहीं है , जिसे जिस खूंटे से चाहा बाँध दिया , बल्कि वो विदूषी होने के साथ-साथ सारी ऊंच-नीच और अपनी हर परिस्थिति को अच्छी तरह से पहचानती भी है और उनके अनुकूल   निर्णय  लेकर अपना जीवन साथी चुनने में पूर्णतः सक्षम है . 

निर्णय हमेशा सही ही हों , ऐसा कोई ज़रूरी भी नहीं है . गलत निर्णय भी हो सकते हैं और होते भी हैं . अपवाद हर क्षेत्र में संभव हैं .


हम इस मामले में कोई एक निश्चित माप-दण्ड ले  कर नहीं चल सकते .


इति शुभम .

                                  U.N. Dutt