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रविवार, 15 दिसंबर 2013

गीत...पीर मन की....डा श्याम गुप्त....

                                        
                      पीर मन की
जान लेते   पीर मन की     तुम अगर,
तो न भर निश्वांस झर-झर अश्रु झरते।
देख लेते जो  द्रगों के  अश्रु कण  तुम  ,
तो  नहीं   विश्वास के  साये   बहकते ।

जान  जाते तुम कि तुमसे प्यार कितना,
है हमें,ओर तुम पे है एतवार  कितना  ।
देख लेते तुम अगर इक बार मुडकर  ,
खिल खिला उठतीं कली गुन्चे महकते।

महक उठती पवन,खिलते कमल सर में,
फ़ूल उठते सुमन करते भ्रमर गुन गुन ।
गीत अनहद का गगन् गुन्जार देता ,
गूंज उठती प्रकृति  में वीणा की गुन्जन ।

प्यार की   कोई भी   परिभाषा  नहीं है ,
मन के  भावों की कोई  भाषा नहीं है ।
प्रीति की भाषा नयन पहिचान लेते ,
नयन नयनों से मिले सब जान लेते ।

झांक लेते तुम जो इन भीगे दृगों में,
जान  जाते पीर मन की, प्यार मन का।
तो अमिट विश्वास के साये  महकते,
प्यार की निश्वांस के पन्छी चहकते ॥