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बुधवार, 6 अगस्त 2014

अधूरा कोई नहीं


लेखिका कवि भारतीय सूचना सेवा की वरिष्ठ अधिकारी और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग में संपादक आर.अनुराधा नहीं रहीं।वह महज 31 साल की उम्र से कैंसर से लड़ रहीं थी।दिल्ली के आयुर्विज्ञान संस्थान में 14 जून को अंतिम सांस ली।1998 में अनुराधा को पता चला की उन्हें स्तन कैंसर हैं।उन दिनों कैंसर आज के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा भयानक और ड़रावना था।जब बीमारी बड़ी हो तो उससे लड़ने का हौसला भी बड़ा होना चाहिए।अनुराधा हार मानने वाले लोगों में नहीं थी,हसते,खेलते,लिखते,पढ़ते यह ज़ग जीत ली।इस दर्द पीछे की आत्मकथा को अभिव्यक्ति दी अपनी पहली किताब – इन्द्रधनुष के पीछे-पीछे:एक कैंसर विजेता की ड़ायरी। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की पत्नी होने के वावजूद आर. अनुराधा की अपनी अलग लेखकीय पहचान थी।किताब का एक अंस -
*मैं जैसे एक बहाव के साथ बहती जा रही थी।नहीं जानती थी कियह कहाँ ले जाएगा।अचानक आई एक कठोर चट्टान से टकरा कर मैंने अस चट्टान को बदूदुआएँ दीँ।तभी मुझे होश आया।सिर उठाकर देखा तो दुनिया नई थी।होश आय़आ तो जाना कि यूँ ही बहते हुए खत्म हो जाना कोई बात नहीं।बहना मेरी नियति तो नहीं।शुक्रिया उस चट्टान का जो जाने कितनी बदूदुआओ का बोझ सँभाले जाने कब से उस बहाव के बीच स्थिर खड़ी हैं।बेहोश और नशे की रो में दिशाहिन हो बहाब के साथ बहते जा रहे लोगों को जगाती हैं,सँभालती और सही राह बताती।आशाओं के इन्द्रधनुष दिखाती हैं।*
 दो बार कैंसर से जंग जीत चुकीं आर.अनुराधा को साल 2012 में फिर कैंसर ने आ दबोचा।इस बार हडिडयों पर हमला किया था।जैसा कि दोस्तो और परिवार के लोगों को भरोसा था,एक बार फिर आर.अनुराधा यह लड़ाई जीत जाएगी लेकिन हर खिलाड़ी खेल के मैदान में हर बार जीत की चाह लेकर उतरता हैं,लेकिन हर बार जीत जाए यह ज़रूरी नहीं होता,आनुराधा यह लड़ाई हार गई।
लगभग 18 साल अनुराधा ने कैंसर के साथ लड़ाई लड़ी थी। लेकिन, ये लड़ाई वो अकेले नहीं लड़ रही थी। दिलीप और उनका बेटा इस लड़ाई में उनके सेनापति थे।इस लड़ाई के दौरान लिखी उनकी तीन कृतिया- – इन्द्रधनुष के पीछे-पीछे:एक कैंसर विजेता ड़ायरी,अधूरा कोई नहीं,सम्पादक पत्रकारिता का महानायक:सुरेन्द्र प्रताप सिंह संचयन पुस्तकों के शब्दों में अनुराधा सदा जीवित रहेंगी।अधूरा कोई नहीं से एक कविता जो बताती हैं आर.अनुराधा के साहस को मौत से लड़ने की कला को जहाँ लोग छोटी छोटी बातों पर मौत को गले लगा लेते हैं उन्हें जीवन जीने के लिए अवश्य प्ररित करेगी।
जैसे कि
केकड़ों की थैलियों से भरा
मेरा बायां स्तन
और कोई सात बरस बाद
दाहिना भी
अगर हट जाए,
कट जाए
मेरे शरीर का कोई हिस्सा
किसी दुर्घटना में
व्याधि में/ उससे निजात पाने में
एक हिस्सा गया तो जाए
बाकी तो बचा रहा!
बाकी शरीर/मन चलता तो है
अपनी पुरानी रफ्तार!
अधूरी हैं वो कोठरियां
शरीर/स्तन के भीतर
जहां पल रहे हों वो केकड़े
अपनी ही थाली में छेद करते हुए।
     अतिंम नमन्
           तरुण कुमार,सावन



बुधवार, 30 अप्रैल 2014

निंदा के पात्र बने रामदेव


संत कलान्तर से ही समाज में व्याप्त बुराईयों की निंदा आए हैं,व समाज को दिशा देते रहे हैं।जो कि उनका धर्म हैं। मगर संतो को व्यक्तिगत निंदा नहीं करनी चाहिए।जब कोई संत व्यक्तिगत निंदा करने लगता हैं तो वह स्वयम् निंदा का पात्र बन जाता हैं।
हाल ही में बाबा रामदेव राहुल गांधी पर रामवाण चलाते हुए चुक गए।दलित महिलाओं व भारतीय नारी का अपमान कर बैठे।परिणाम सरूप वह जिनकी महत्तवकांछाओं को पूर्ण करने में लगे हुए थे।वह भी उनके इस बयान से किनारा करते हुए,उनके बयान की निंदा कर रहें हैं। बाबा रामदेव और विवाद का यूं तो चौली दामन का साथ रहा हैं।लेकिन यह मामला जदा संवेदनशिल हैं क्योंकि यह आधी आवादी के मान, सममान,मर्यादा को चोट पहुचाता हैं।
प्रश्न सिर्फ यौग गुरू बाबा रामदेव के बयान का नहीं हैं,न ही भौगी आशाराम बापू का हैं।यह पूरे संत समाज पर लागू होता हैं। आख़िर वो समाज को किस रास्ते पर ले जाना चहाते हैं। यह बयान किसी नेता ने दिया होता तो और बात थी क्योंकि नेता तो जुबान के यूं भी कच्चे होते हैं।लेकिन यह संत के वचन हैं जिसकी गुंज दूर तक सुनाई देती हैं।संत समाज के माथे पे लगा यह वह कलंक हैं,जो गंगा नहाने पर भी नहीं धुलेगा।
                               
तरूण कुमार,सावन