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रविवार, 10 मार्च 2013

सर्वप्रथम नियम व नियमानुशासन प्रणेता.... सूर्यपुत्र यम... डा श्याम गुप्त

                      सृष्टि के मानव इतिहास में मानव आचरण व मर्यादा के सर्वप्रथम नियम व नियमानुशासन प्रणेता.... सूर्यपुत्र यम...

                        
            
                    आज  महिला दिवस पर महिला सशक्तीकरण, महिलाओं पर अत्याचार के विरुद्ध विभिन्न भावों , वक्तव्यों, आकांक्षाओं, आशाओं, इच्छाओं, सुझावों , क़ानून व उसके पालन पर जोर, नए-नए नियमों आदि  का प्रकटीकरण जोर-शोर पर है जो निश्चय ही एक जागरूक समाज के लक्षण हैं | इन सबके साथ  जो अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य  है वह है 'मानव आचरण' का  |  सब कुछ होते हुए भी जब तक मानव मात्र ..चाहे पुरुष हो या नारी... सद-आचरण का व्यबहार नहीं करेगा, कोई उपाय सफल नहीं  हो सकता क्यंकि प्रत्येक स्थान पर कार्य करने वाला, कृतित्व को अंजाम देने वाला  भी  मनुष्य ही है एवं परिणाम भुगतने वाला भी वही मानव है |
                      ऋग्वेद में यम-यमी आख्यान नामक एक कथा है जो अथर्व वेद  में भी पुन: कही गयी है ,जिसकी प्राय: विधर्मी व विद्वेषी लोग गलत अर्थ लेकर आलोचना भी करते हैं | वह मानव -इतिहास की एक विशेष , मील का पत्थर है ...टर्निंग पॉइंट | यम व यमी  विवस्वान सूर्य एवं सरण्यू के जुड़वां पुत्र-पुत्री थे| उस काल में आचरण बंधन नियम नहीं  थे ...यमी अपने स्थान पर प्रवास के दौरान ..यम से संतानोत्पत्ति की इच्छा जाहिर करती है | परन्तु यम ,, नए व उचित आचरण नियमों की रचना व स्थापना करते हैं |... यम का कथन है ...
   " न ते सखा सख्यं वष्टये तत्स लक्ष्यायद्विसुरूपा भवाति | 
   महास्पुमासो असुराकर्मवीरा दिवोध्वरि उर्विया परिख्यनि ||."..ऋग्वेद 10/10/८८६७  एवं अथर्ववेद 18/१/१ ...
----- ...हे यमी ! आपका ये साथी यम इस सम्बन्ध का इच्छुक नहीं है क्योंकि आप सहोदरा हैं | अतः यह अभीष्ट नहीं है, लक्ष्य-प्राप्ति हित वि-स्वरुप अर्थात प्रतिकूल हैं | अन्य  बहुत से असुर वर्ग ( अन्य वर्ग ...भिन्न वर्ग के लोग ) उपस्थित हैं आप उनसे संगति करें |..तथा...
" आ धा ता गच्छानुसरा युगानि यत्र जामय कृणवान्नजादि | 
उप ववृद्धि बृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्य सुभगे पति मत ||"..  .... हे सुभगे! हो सकता है कि इस प्रकार भविष्य में सहोदरा, बंधुत्व भाव रहित भाइयों को ही पति रूप में स्वीकारें | हम नियम स्थापित करें | अतः आप मुझसे  यह अपेक्षा न  करें |
      
              इसका सामान्य व्यवहारिक वैज्ञानिक  पक्ष है कि यम का कथन है कि दो समान परिवार, कुल व सम्बन्ध  वाले स्त्री-पुरुष आपस में सम्बन्ध न करें अपितु अन्य दूरस्थ सम्बंध वालों में सम्बन्ध होना चाहिए | यह  गोत्र संस्था व जेनेटिक -शास्त्र का प्रथम कथ्य है |
           उपाख्यान की   भौतिक  विज्ञान की  व्याख्या के अनुसार ... बिगबेंग या श्रृष्टि के पश्चात शक्ति कण व चेतन कणों का प्रादुर्भाव हुआ ..शक्ति कण असुर कहलाये एवं चेतन कणों को सुर कहा गया ....
            ---  शक्ति कण +शक्ति कण = पदार्थों, प्रकृति  का निर्माण हुआ  एवं
              ---चेतन कण +शक्ति कण = चेतन तत्व प्राण तत्व का निर्माण होता है | अतः चेतन +चेतन से कोई निर्माण नहीं होता अतः चेतन तत्व यमी को  नवीन तत्वों , पदार्थों या बलिष्ठ व उच्च बौद्धिक संतति हेतु शक्ति तत्व... असुरकणों , असमान , दूरस्थ सम्बन्ध वाले  से सम्बन्ध बनाना चाहिए |
                     वास्तव में उपाख्यान का सामाजिक, दार्शनिक व धार्मिक व आचरण गत अर्थ है कि यदि किसी विशेष परिस्थितिवश, एकांत या अन्य प्रभाव वश  स्त्री या पुरुष किसी में भी आचरण दौर्वल्यता या आती है तो अधिक समझदार, विज्ञ, अनुभवी, बलशाली  स्त्री-पुरुष का यह कर्तव्य व दायित्व  है कि मर्यादा का पालन करे व कराये न कि  दूसरे की दुर्बलता व परिस्थिति का अनुचित लाभ उठायें | पुरुष यदि इसका दृड़ता से पालन करें तो वे बलात्कार , स्त्री हिंसा, यौन उत्प्रीडन में रत होने से बचे रहेंगे | समाज में अधिकतर ..अपेक्षाकृत बलिष्ठ एवं अधिक सामर्थवान स्थिति पर होने के कारण निश्चय ही  ( यम की भाँति ) पुरुष का यह गुरुतर दायित्व है |

                          इस प्रकार यम सृष्टि के सर्वप्रथम सामाजिक, व्यवहारिक व आचरण के नियामक बने इसीलिये .. .नियम को 'नियम, नियमानुशासन, यमानुशासन,  यम-नियम एवं आयाम आदि  कहा जाता है | और यम को सृष्टि का अनुशासक |


                

बुधवार, 1 अगस्त 2012

राखी व रक्षाबंधन पर्व के निहितार्थ ... डा श्याम गुप्त..




                 
                'बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बांधा है '... रक्षाबंधन भाई-बहन के शाश्वत प्रेम का प्रतीक है | क्या यह  सिर्फ अपने भाई, अपनी बहन के प्रेम का प्रतीक  है ?  क्या भाई द्वारा अपनी बहन की रक्षा हेतु राखी का बंधन अनिवार्य है, क्या राखी बांधे बिना भाई बहन की समय पर सहायता करना भूल जायगा ?  कैसे हो सकता है ?  राखे बंधे या न बंधे भाई तो अपनी बहन की रक्षा करेगा ही | फिर रक्षाबंधन का क्या महत्त्व ?
                  क्या भाई को केवल बहन की ही रक्षा करना चाहिए ...पुत्र को माँ की या पिता की नहीं, या पिता को पुत्री की, पति को पत्नी की नहीं |    वास्तव में यह सिर्फ भाई द्वारा बहन की रक्षा का ही नहीं अपितु प्रत्येक पुरुष द्वारा प्रत्येक स्त्री की ...प्रत्येक बहन..बहनों की रक्षा हेतु स्वयं बंधन- संकल्प  का पर्व है |  परिवार, पडौस, समाज की, नगर की, ग्राम की, विश्व की प्रत्येक महिला, स्त्री, बच्ची को बहन की  निगाहों से देखने के संकल्प का पर्व है | प्रत्येक पुरुष को सभी स्त्रियों को माँ-बहन की भांति देखना  चाहिए | यद्यपि छोटी बच्ची को माँ न कहा जासके ( यद्यपि पुरा काल में सभी स्त्रियों को माँ कहकर ही पुकारा जाता था चाहे छोटी हो या बड़ी --आज भी भारत के दक्षिण के राज्यों में हर उम्र की स्त्री को माँ  या अम्मा कह कर पुकारा जाता है...चाहे अपनी स्वयं की माँ को आई कहा जाता हो ..)  परन्तु बहन के लिए कोइ उम्र सीमा नहीं होती ...एक वर्ष की बच्ची भी बहन हो सकती है ७० वर्ष की वृद्धा भी | इसीलिये आज का दिन यह संकल्प का है कि प्रत्येक पुरुष प्रत्येक स्त्री को बहन के समान समझे एवं उसी प्रकार व्यवहार करे ..उसके मान-सम्मान की रक्षा हेतु न सिर्फ  स्वयं तत्पर रहे अपितु अन्य भी करें  एवं उसका सामाजिक, मानसिक व शारीरिक उत्प्रीणन  न हो यह सुनिश्चित करे | इसीलिये रक्षाबंधन को भाई-बहन का त्यौहार कहा जाता है |
                         यदि हम आज के दिन इस पर्व का वास्तविक निहितार्थ समझें, यथा भाव संकल्प करें तो निश्चय ही हम  न किसी बच्ची, युवती,  महिला का उत्प्रीणन  करेंगे न होने देंगे तभी  समाज में उच्च मानव आचरण , व्यावहारिक आदर्शों  व संस्कारों की स्थापना होगी और हमारे समाज से स्त्रियों पर आये दिन होने वाले अनाचार,अत्याचार, उत्प्रीणन , हिंसा, बलात्कार , यौन उत्प्रीरणन ... आदि का कलंक मिट सकता है | यही एक मात्र उपाय है तभी हम इस पर्व को  मनाने के सच्चे अधिकारी होंगे |