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बुधवार, 12 सितंबर 2012

एक ही रास्ता ...डा श्याम गुप्त की कहानी...


                        
                 क्या बात है , आज बड़ी सुस्त-सुस्त सी बोल रही हो मुक्ता !, फोन पर बात करते हुए शालिनी पूछने लगी |
                ‘कुछ नहीं, क्या बताऊँ शालिनी, आज न जाने किस बात पर राज ने चांटा मार दिया मुझे‘, मुक्ता कहने लगी, ’आजकल हर बात पर मूर्ख कहना, बात बात पर तुममें अक्ल नहीं है इत्यादि कहने लगा है राज | कितनी बार हर प्रकार से समझाया है | हर बार सौरी यार ! कहकर माफी मांग लेता है, मनाता भी है और फिर वही | पता नहीं क्या होगया है राज को, पहले तो ऐसा नहीं था | इतना पढ़े-लिखे होने के बावजूद भी हम क्या कर पाती हैं | सिवाय इसके कि तलाक लेलो.... क्या और कोई मार्ग नहीं है शालिनी हम लोगों के पास ?
                ‘क्या किया जाय मुक्ता, घर-घर यही हाल है | यही कहानी है स्त्री की अब भी | जाने क्यों एक नारी के उदर से ही जन्मा पुरुष क्यों उसे ही ठीक से समझ नहीं पाता और ऐसा व्यवहार करने पर आमादा होजाता है | लोग कहते हैं कि नारी को ब्रह्मा भी नहीं समझ पाया | पर पुरुष का यह व्यवहार सदा से ही समझ से परे है |’ शालिनी कहने लगी |     
                मुक्ता सोचने लगी,  ‘उसने प्रेम-विवाह किया, घर वालों से लड़-झगड कर | यद्यपि उचित कारण था | पुराने विचारों वाले रूढ़िवादी परिवार में जन्म लेना और अपनी दो बड़ी बहनों की इसे ही परिवारों वाले ससुराल में दशा देखकर भाग जाना चाहती थी वह उस माहौल से | आधुनिक परिवार, आधुनिक विचारधारा के साथ जीवनयापन हेतु | मिला भी सब कुछ ठीक-ठाक | पति, परिवार, सास-ससुर, खानदान | परन्तु आज  इस मोड़ पर..... क्यों सोचना पड रहा है |’
               उसे काम बाली बाई की याद आने लगती है | कुछ महीने पहले ही जब उसे पता चला था कि उसका पति उसे रोजाना मारता -पीटता है तो स्वयं उसने कहा था कि छोड़ क्यों नहीं देती | कितना आसान है दूसरों को परामर्श देदेना | उसे याद आया बाई का उत्तर ,’ क्या करें मेमसाहिब, कहाँ जायं | मारता है तो प्यार भी करता है | दो ही रास्ते हैं, या तो ऐसे ही चलने दिया जाय या छोडकर अलग होजायं और दूसरा करलें | दूसरा भी कैसा होगा क्या भरोसा | तीसरा रास्ता है ...अकेले ही रहना का | सब जानते हैं बीबीजी कि अकेली औरत का कोई नहीं होता, न रिश्ते-नातेदार, न परिवार, न पडौसी, न समाज | सरकार चाहे जितने क़ानून बनाले, पर सरकार है कौन ? वही पडौसी, समाज के लोग | वे ही पुलिस वाले, वकील व जज हैं | और जब तक आपको स्वयं को और सरकार–पुलिस को पता चलता है, होश आता है, सरकारी मशीन कार्यरत होती है ज़िंदगी खराब हो चुकी होती है |  फिल्मों की हीरोइनों एवं तमाम पढ़ी लिखी ऊंची अफसर औरतों की अलग बात है | पर हीरोइनों की भी जिंदगी भी कोई ज़िंदगी है मेमसाहिब, और अंत तो खराब ही होता है अक्सर |  और अकेले पुरुष को भी कौन पूछता है यहाँ |  जिस आदमी के साथ कोई नहीं होता क्या नहीं करता ये समाज- संसार, ये लोग उसके साथ | इससे तो अच्छा है कि लड़ते-झगडते, पिटते-पीटते, कभी दबकर, कभी दबाकर यूंही चलने दिया जाय | पुरुष को प्यार से जीतो या सेवा..तप..त्याग से, चालाकी से या ट्रिक से | स्त्री को पुरुष को जीतना ही होता है यही एक रास्ता है | बाहर तमाम पुरुषों की गुलामी की जलालत भरी ज़िंदगी से तो एक पुरुष की गुलामी अधिक बेहतर है | कितना अच्छा होता बीबीजी मर्द लोग भी हमारे बारे में ऐसा ही अच्छा सोचते |’
              परिवार वालों के साथ कोइ प्रोब्लम है क्या ?’ फोन पर शालिनी पूछ रही थी | मुक्ता अपने आप में लौट आई, बोली,’ नहीं , मम्मी–पापा बहुत अच्छे हैं | वे स्वयं कभी-कभी परेशान होजाते हैं राज के इस व्यवहार से |’
              ‘तो मेरे विचार से यह व्यक्तिगत मामला है, शालिनी कहने लगी, ’ जो प्रायः चाहतों का ऊंचा आसमान न मिल पाने पर इस प्रकार व्यक्त होने लगता है | हो सकता है तुम उसकी चाहत व आकांक्षा के अनुरूप न कर पाती हो या किन्हीं बातों से उसका अहं टकराता हो | या दफ्तर की कोई प्रोब्लम हो | हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि पुरुष को, पति को ऐसे व्यवहार करने की छूट है | दौनों मिलकर सुलझाओ, खुलकर बात करो इससे पहले कि बात और आगे बढे | दूसरे शायद ही इसमें कुछ कर पायें | बड़े अनुभवी लोगों का परामर्श भी राह दिखा सकता है पर कितनी दूर तक | चलना तो स्वयं को ही पडता है |
            यह भी है कि कुछ पुरुष, बच्चे ही होते हैं, मन से ..पर मानने को तैयार नहीं होते| वे विशेष रूप से अटेंशन चाहते हैं हर दम | कई बार संतान के आने पर भी ऐसा होता है |’, शालिनी पुनः कहने लगी, ’प्यार से आदमी को काबू में करना ही औरत की तपस्या है, साधना है, त्याग है | जो पुरुष की तपस्या भंग भी कर सकती है मेनका-विश्वामित्र की भांति, वैराग्य भी भंग कर सकती है शिव-पार्वती की भांति और उसे तपस्या-वैराग्य में रत भी कर सकती है तुलसी—रत्ना की भांति |  काश सभी पुरुष नारी की इस भाषा को समझ पाते | इस भावना व क्षमता की कदर कर पाते |
             ‘पर पुरुष यह सब कहाँ समझता है अपने अहं-अकड में |’ मुक्ता बोली |
             सचमुच, शालिनी कहने लगी, मैं सोचती हूँ कि एक ही आशापूर्ण रास्ता बचता है कि हम स्त्रियाँ जब अपने त्याग, तपस्या से अपनी संतान को विशेषकर पुत्र को संस्कार देंगीं तभी पुरुषों में संस्कार आयेंगे..बदलाव आएगा | इस बदलाव से ही स्त्री का जीवन सफल, सहज व सुन्दर होगा |
         “ यहि आशा अटक्यो रहे अलि गुलाव के मूल |”

सोमवार, 5 मार्च 2012

इन्द्रधनुष.....अंक चार .-----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का का उपन्यास ....



      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास (शीघ्र प्रकाश्य ....)....पिछले अंक तीन  से क्रमश:......
                                       
                                                        अंक चार 

                " प्रेम होना या करना एक अलग बात है वह व्यक्ति के वश में नहीं है ।  अपने प्यार को प्राप्त कर लेना,  प्रेमी से प्रेम-विवाह  एक सौभाग्य की बात है ।   परन्तु एक अन्य पक्ष यह भी है कि प्रेम को भौतिक रूप में पा लेना या प्रेम विवाह कोई  इतना महत्वपूर्ण व आवश्यक भी नहीं है कि उसके लिए संसार में सब कुछ त्यागा जाय ।   माता-पिता, रिश्ते-नाते, समाज, मान्यताएं, मर्यादाएं, बंधन व नैतिकता की सीमाएं तोडी जायं ।  अपना सारा केरियर दांव पर लगाया जाय ।  यह इतनी बड़ी उपलब्धि भी नहीं है कि प्राण त्यागने को भी प्रस्तुत रहा जाय, जो ईश्वरीय देन है ।  क्योंकि  ' आत्म एव यह जगत है '  वस्तुतः हम प्रत्येक कार्य सिर्फ स्वयं के लिए ही करते हैं ।  परमार्थ में भी आत्म-सुख का भाव छुपा रहता है ।  सभी बंधन, सहयोग भी आत्मार्थ से ही जुड़े रहते हैं।  हम देंगे तभी मिलेगा भी  आत्मार्थ भाव ही है ।  अतः सिर्फ प्रेम-विवाह की जिद में सारा केरियर, सांसारिक सम्बन्ध यहाँ तक कि जीवन भी खोना पड़ता है तो शायद यह बहुत अधिक मूल्य है ।  संसार में ऐसी कौन सी प्रेम-कथा है जो इस तरह के सम्बन्ध में परिणत होकर उन्नत शिखर पर पहुँची हो,  या जो सुखान्त हो  एवं  जिससे देश व समाज या व्यक्ति स्वयं उन्नत हुआ हो ।"
             " प्रायः कहा जाता है कि महिलायें भावुक होती हैं ।  परन्तु यह सर्वदा सत्य नहीं है । वैदिक विज्ञान के अनुसार . पराशक्ति -पुरुष सिर्फ भाव रूप में शरीर या किसी पदार्थ में प्रविष्ट होता है जबकि अपरा-शक्ति नारी, प्रकृति, माया, शक्ति या ऊर्जा रूप है जो पदार्थों व  शरीर  के भौतिक रूप का निर्माण करती है । अतः पुरुष भाव-रूप होने से अधिक भावुक होते हैं, स्त्रियाँ इसका लाभ उठा पाती हैं ।"
            ' एक्सीलेंट , न्यू आइडियाज़ , नेवर हार्ड ऑफ़ '...एक दम नवीन विचार हैं, पहले कभी नहीं सुने गए ।
            ' स्टूडेंट कल्चुरल असोसिएशन ' के तत्वावधान में आयोजित वाद- विवाद प्रतियोगिता में " नारी-जागरण के सन्दर्भ में प्रेम, प्रेम-विवाह के बढ़ते चरण व नारी-पुरुष समानता " विषय पर मेरे द्वारा व्यक्त किये गए विचारों के उपरांत साथ में बैठे विनोद ने उपरोक्त वाक्य हाथ मिलाते हुए कहे ।
            थैंक्स, मैं मुस्कुराया ।
            क्या ये आपके ओरिजिनल विचार हैं ? अचानक पीछे की सीट पर बैठी हुई कुमुद नागर ने पूछा ।
            ऑफकोर्स, मैंने हैरानी से कहा ।
           ' ओह माई गाड!' ..वह स्वयं ही बोली ।
           क्या हुआ!
           नथिंग ।
           ठीक तो हो, मैंने  पूछा ।
           हाँ, मैं चलती हूँ ।
           कुमुद की बगल में बैठी हुई सुमित्रा ने मेरी और देखा ।  फिर मुस्कुराकर बोली, 'फेंटास्टिक' , क्या बात है।  ये उम्र और ये ऊंची ऊंची बातें कहाँ से सीखते हो ?
          'पढो..पढो..और  पढो । चिंतन-मनन करो, प्रत्येक बात पर ।'  मैंने हंसते हुए कहा ।
           मैं नहीं समझती किसी के पल्ले कुछ ख़ास पडा होगा ।  अधिकाँश के तो सिर  के ऊपर से निकल गया होगा ।  ऊंची चीज़ है न ?
          ' क्या खींचने को कोई और नहीं मिला ?'
          ' मिले तो बहुत पर तुम जैसा नहीं ।'
           जाओ, अपना भाषण पढो । बुलाया जारहा है, देखें क्या तीर चलाती हो ।
                     " स्त्री -पुरुष समानता  का क्या अर्थ है ? ",  सुमित्रा ने अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया , " अपने कर्तव्यों और मर्यादाओं की सीमा में रहते हुए, स्त्री-पुरुष एक दूसरे का आदर करें ।  यदि पुरुषों का एक अलग संसार है तो नारी का भी एक  'स्व'  का संसार है ।  कला, साहित्य, संगीत, गृहकार्य, सामाजिक-सांस्कृतिक सुरक्षा दायित्व में तो वे पुरुषों से आगे रहती ही हैं ।"
                  " स्त्री स्वतन्त्रता होनी ही चाहिए , पर क्या पुरुष से स्वतंत्रता ? या अपने सहज कार्यों से ?...नहीं न । तो स्त्री-जागरण व  स्वतंत्रता का क्या अर्थ हो ?  पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर समाज, देश व धर्म-संस्कृति के कार्यों में सामान रूप से भाग लेना ।  स्त्री स्वतन्त्रता सिर्फ पुरुषों के साथ कार्य करना, पुरुषों की नक़ल करना, पुरुषों की भाँति पेंट-शर्ट पहन लेना भर नहीं है ।  क्या कभी पुरुष..पायल, बिछुआ, कंकण, ब्रा आदि पहनते हैं ? सिन्दूर लगाते हैं । क्या कोई महिला पुरुषों के साथ नहाने-धोने, कपडे बदलने  में सहज रह सकती है ? तो क्यों हम पुरुषों की नक़ल करें ?  समानता होनी चाहिए , अधिकारों व कर्तव्यों के पालन में । एक व्यक्तित्व को दूसरे व्यक्तित्व को सहज रूप से आदर व समानता देनी चाहिए ।"
              'एक्सीलेंट,बहुत खूब',  सभी के सराहना के स्वर समवेत स्वर में हाल में गूँज उठे । हाल से  बाहर निकलते हुए  मैंने प्रशंसा के स्वर में  कहा , ' रीयली एक्सीलेंट सुमि!  जीनियस'..और स्त्री-पुरुष संबंधों पर तुम्हारे क्या विचार हैं ?
               सुमि जोश में थी बोली,  'मैं समझती हूँ  प्रत्येक व्यक्तित्व को एक मित्र,  राजदार, भागीदार की आवश्यकता होती है। व्यक्ति अकेला कुछ नहीं होता ।  हम इसलिए हम हैं कि अन्य हमें वह मानते हैं, समझते हैं ।   ईश्वर तभी ईश्वर है जब भक्त उसे मानता व पूजता है।   हाँ उसे स्वयं को उस स्तर तक  उठाना चाहिए। सखियाँ तो सदा बचपन से होती ही हैं, परन्तु महिला मित्रों से केवल  आधी दुनिया  को जानने  की  संतुष्टि  होती है।   शेष आधी दुनिया जो पुरुषों की है उसे जाने बिना आत्म-तत्व की पूर्ण संतुष्टि नहीं होती । इसीलिये एक वय  के उपरांत पुरुष मित्र भाने लगते हैं । यही बात पुरुषों के साथ भी है । यद्यपि इसमें हमारे शरीर-विज्ञान की मान्यताएं भी पार्ट-प्ले करती हैं । इसलिए महिलायें पति में सच्चा मित्र देखना चाहती हैं । पति तो कोई भी हो सकता है, परन्तु यदि सच्चा मित्र पति हो तो क्या कहना । और पति यदि सच्चा मित्र बन जाय तो दुनिया सुखद-सुहानी रहे । अतः पुरुषों को सच्चा मित्र पहले होना चाहिए ।  वैसे पुरुष की जो 'सृष्टिगत अहं या ईगो'  है  उसके कारण वह सदैव नारी का सुरक्षा कवच बनना चाहता है ।  नारी को भी यह अच्छा लगता है, क्योंकि इससे  'शक्ति'  का अहं  तुष्ट होता है ।  भाई, पिता, पुत्र , पति , मित्र..सभी में यह सुरक्षा कवच बनने का भाव होता है ।  यह जेनेटिक, संस्कारगत होता है।  बस, जब पुरुष में किसी कारणवश  हीन- भावना आ जाती है तभी वह केवल पति या मालिक होने का व्यवहार करके अपने अहं की तुष्टि करता है  जो अति के रूप में अत्याचार-उत्प्रीणन में परिवर्तित हो जाता है।   हाँ, कुछ उदाहरणों में यह नारी के सन्दर्भ में भी घटित होता है।"
                 ' यूं आल्सो हैव एक्सीलेंट न्यू आइडियाज़  नैवर हार्ड ऑफ़ '...अचानक पीछे से विनोद की आवाज़ आई और  साथ में तालियाँ ।
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                                   -------क्रमश:..... अंक चार का शेष ..... अगली पोस्ट में.....