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गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

श्याम स्मृति.....सादा जीवन ..क्यों ...डा श्याम गुप्त ....



सादा जीवन ..क्यों ..

        जब कभी कोई किसी को अपने से अच्छा, खाते-पीते..विलासमय जीवन बिताते देखता है तो दो प्रकार के विचार मन में आ सकते हैं ...

       (१)-मुझे भी कठोर श्रम करना चाहिए ताकि मैं भी उसकी भांति अच्छा जीवन व्यतीत कर सकूं |....यह विचार प्रत्येक व्यक्ति को कठोर श्रम करने को प्रेरित करेगा एवं स्वयं उसका ही नहीं समाज व राष्ट्र की प्रगति का भी समुचित कारक बनेगा |

       (२) यदि मैं एसा जीवन व्यतीत नहीं कर पारहा तो दूसरे क्यों करें !  धनी व्यतियों को धन अन्य में भी बाँटते रहना चाहिए अन्यथा हमें धनी व्यक्तियों का धन छीन लेना चाहिए और गरीबों में बाँट देना चाहिए ताकि सब बराबर होजायं | कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस विचार से समाज व विश्व में एक कुहराम सा फ़ैल जायगा |

        अब प्रश्न उठता है कि क्या सभी लोग (१) की भांति सोचेंगे, क्योंकि यह मानव मन वायवीय तत्व है और सदैव सरल रास्तों को अपनाता है और रास्ता (२) एक सरल मार्ग है |

      अतः यदि हम सभी सादा जीवन एवं नियमानुसार परिश्रम से कमाए धन पर विचार  (१) के अनुसार चलें तो  व्यक्तिगत जीवन, समाज व राष्ट्र में  एक सम्पूर्ण सहज़ता, समता व समन्वयता का वातावरण बना रहेगा |