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शनिवार, 3 दिसंबर 2011

चूल्हे -चौके का गीत -संगीत ...सुषमा गुप्ता

                इच्छा शक्ति हो तो  सब कुछ किया जा सकता  है ....नारी तो जंगल में भी मंगल कर देती है | देखिये इसी भाव पर श्रीमती सुषमा गुप्ता का एक गीत ..... .डा श्याम गुप्त

   चूल्हे -चौके की खटरस में ...गीत ..

चूल्हे - चौके की खटपट में ,
समय भला कब मिल पाता है |
सब्जी कढ़ी दाल अदहन में,
गीत भला कब बन पाता है ||

तवा कड़ाही चमचा कलछा ,

के स्वर की रागिनी सजे नित,
दूध चाय पानी  के स्वर में ,
कब संगीत उभर पाता है ||

पर मन में संगीत बसा हो,
सब कुछ संभव होजाता है |
गुन-गुन में मनमीत बसा हो ,
तो मन गीत सजा जाता है ||

चूल्हे चौके की खटरस में,

ताल बंद लय मिल जाते हैं |
थाली बेलन चकले के स्वर,
सुर और राग बता जाते हैं ||

दाल झोल अदहन के स्वर भी,
नाद अनाहत बन जायेंगे |
मन में प्रिय रागिनी बसी हो,
गीत स्वयं ही सज जायेंगे ||

गरमा गर्म रसोई की जब,

उठती भीनी गंध सुहानी |
लगती सुन्दर काव्य-भाव सी ,
बन जाती इक कथा कहानी ||

मेरे गीतों में जीवन की,
खुशियों की थिरकन होती है |
उन गीतों में जन जन मन की ,
ह्रदय की धड़कन होती है ||

चूल्हे चौके की खट-पट में,

समय कहाँ फिर मिल पाता है |
मन में प्रिय रागिनी बसी हो,
गीत लवों पर खिल आता है ||
     
                   प्रस्तुति----  सुषमा गुप्ता, लखनऊ