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शनिवार, 2 अगस्त 2014

छाये श्यामल घन चहुँ ओर... डा श्याम गुप्त ..



 --- यद्यपि आसमान में श्यामल घन छाये रहते हैं ..परन्तु वे जल वर्षा में संकुचित भाव अपनाए हुए हैं---तो क्यों न गीत में ही झना जहाँ वर्षा का आनंद उठा लिया जाय ......

छाये श्यामल घन चहुँ ओर

छाये श्यामल घन चहुँ ओर
झनन झन बरसे पानी |
छाई श्याम घटा घनघोर
झनन झन बरसे पानी |
आये दूर देस ते आली
झनन झन बरसे पानी ||

भीजें खेत बाग़ घर आँगन
भीजें तरु उपवन मग कानन |
अलि! भीजे डाली डाली
झनन झन बरसे पानी |
सखि! भीजे छप्पर छानी
झनन झन बरसे पानी ||

प्यासी धरती प्यास बुझाए
खेतों में अंकुर हरियाये |
सखि! फहरे चूनर धानी
झनन झन बरसे पानी |
कहै मुरिला प्रीति के बानी
झनन झन बरसे पानी ||

अम्बर बरसे सब जग हरसे
तन तरसे अंतरमन सरसे |
बहे शीतल पवन सुहानी
झनन झन बरसे पानी|
जिया धड धड धड़के आली
झनन झन बरसे पानी ||

सजनी भीजे साजन भीजे
मन भीजे मनभावन भीजे |
अलि ! छलके प्रीति पुरानी
झनन झन बरसे पानी |
मन चाहे करन मनमानी
झनन झन  बरसे पानी ||