सोमवार, 16 सितंबर 2013

बलात्कार करने वाला कभी नाबालिग नहीं होता


बलात्कार से सम्बंधित कानून में बालिग व् नाबालिग का अंतर ख़त्म होना चाहिए क्योंकि बलात्कार करने वाला कभी नाबालिग नहीं होता .इसका सम्बन्ध उम्र से नहीं अपराध से जोड़ा जाना चाहिए .दामिनी के साथ न केवल बलात्कार बल्कि दरिंदगी की सारी सीमायें पार करने वाला अफरोज यदि नाबालिग के आधार पर कानून से बच जाता है तो यह पूरे मानवीय समाज के मुंह पर तमाचा मारे जाने जैसा है .वैसे भी अफरोज मुसलमान है और मुस्लिम कानून के अनुसार वो बालिग है .अफरोज को यदि भारतीय कानून ने फाँसी पर नहीं चढ़ाया तो भारतीय समाज में एक गलत सन्देश जायेगा जिसका खामियाजा भविष्य में भारतीय समाज को भुगतना होगा .



शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 14 सितंबर 2013

भारतीय नारी ब्लॉग प्रतियोगिता -४

भारतीय नारी ब्लॉग प्रतियोगिता -४





क्या है भारतीय नारी की छवि आपके विचार में ? लिख भेजिए कविता ,आलेख के रूप में .शब्द सीमा-४००



अंतिम तिथि -३० सितम्बर २०१३



नियम व् शर्ते



*अपनी प्रविष्टि केवल इस इ मेल पर प्रेषित करें [shikhakaushik666@hotmail.com].अन्यत्र प्रेषित प्रविष्टि प्रतियोगिता का हिस्सा न बन सकेंगी .प्रविष्टि के साथ अपना पूरा पता सही सही भेंजे .

* प्रतियोगिता आयोजक का निर्णय ही अंतिम माना जायेगा .इसे किसी भी रूप में चुनौती नहीं दी जा सकेगी .

*प्रतियोगिता किसी भी समय ,बिना कोई कारण बताये रद्द की जा सकती है .

* विजेता को आकर्षक पुरस्कार प्रदान किया जायेगा .

*उत्तर भेजने की अंतिम तिथि ३० सितम्बर २०१३ है .

*प्रतियोगिता परिणाम के विषय में अंतिम तिथि के बाद इसी ब्लॉग पर सूचित कर दिया जायेगा .





शिखा कौशिक 'नूतन'

[व्यवस्थापक -भारतीय नारी ब्लॉग ]





















भारतीय नारी ब्लॉग प्रतियोगिता -3 परिणाम

भारतीय नारी ब्लॉग प्रतियोगिता -3 के लिए केवल एक प्रविष्टि प्राप्त हुई जो प्रतियोगिता के मानकों को पूरा नहीं कर पाई .इसलिए किसी को भी इस बार विजेता घोषित नहीं किया जा रहा है .कुछ इस प्रकार से थी प्रतियोगिता व् प्राप्त प्रविष्टि -







''भारतीय नारी '' ब्लॉग प्रतियोगिता -3







एक नारी होकर आपने कैसे किया पुरुष समाज का सामना ?क्या आप दे पाई किसी कुप्रथा को चुनौती ?और यदि आप हैं पुरुष तो आपने कैसे दिया किसी नारी का साथ किसी कुप्रथा से लड़ने में ? दो सौ शब्दों की सीमा में लिख दीजिये अपना संस्मरण .यही है -''भारतीय नारी '' ब्लॉग प्रतियोगिता -3

प्राप्त प्रविष्टि -



मेरा घर



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कहते है घर गृहणी का होता है



लेकिन यह सच नहीं है



घर में रहने वालो से पूछो



घर किसका होता है .



घर होता है दादा का,पापा का,



बेटे का,और उसके बेटे का



सदियों से यही चला आ रहा है



घर ना बेटी का होता है ,न ही बहू का



बेटी को तो बचपन से ही सिखाया जाता है



ये घर तेरा नहीं है



तुम्हे अभी अपने घर जाना है (ससुराल )



बेटी बेचारी अपने घर के सपने सँजोए



मन उलझाये ही रहती है



फिर एक दिन जब वो अपने घर चली जाती है



अपने - अपनों के जाल में फँसकर



हर चीज को तरस जाती है



मन को यही दुविधा सताती है



पता नहीं इस अपने कहे जाने वाले घर से



जाने कब निकाली जा सकती है .



वह बेचारी भोली सी,नादान सी,



समझ ही नहीं पाती कि ... घर भी कभी



किसी औरत का हुआ है जो अब होगा .



घर औरत से बनता है ,सजता है,



औरत ही घर की जननी है



लेकिन यह बनाना बिगाड़ना पुरूष ही करता है



क्योकि अपना देश तो पुरूष प्रधान देश है .



यहाँ औरत स्वतन्त्रता के नाम पर



खुले आसमान के नीचे



बन्धनों की चाहर -दिवारी से कैद है



लेकिन फिर भी नकारात्मक सच है



कि .......घर गृहणी का ही होता हे.



नीतू राठौर



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प्रस्तुतकर्ता -शिखा कौशिक 'नूतन





निर्भया ने ली होगी सुकून की अब साँस !

तारिख थी सोलह

सन दो हजार बारह ,

और दिसंबर मास !

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हैवानियत की इन्तिहाँ ,

इंसानियत का क़त्ल ,

इंसानी जिस्मों में

वहशियत का वास !

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निर्भया की आहें

जख्मों पे उसकी टीसें ,

गूंजती रही हैं

आज तक आस-पास !

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दरिंदों को मिली फाँसी ,

कितना सुखद अहसास !

निर्भया ने ली होगी

सुकून की अब साँस !



शिखा कौशिक 'नूतन'

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

वो पुरुष ही क्या जिसमे पौरुष के न हो दर्शन


वो पुरुष ही क्या जिसमे पौरुष के न हो दर्शन ,

विवश हो जिसके समक्ष नारी स्वयं कर दे समर्पण !

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नीच दुष्ट राक्षस पिशाच की श्रेणी के नर ,

पौरुषहीन ही हैं करते बलात स्त्री का हरण !

विवश हो जिसके समक्ष नारी स्वयं कर दे समर्पण !

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जिसका बुद्धि और भुजबल आकृष्ट कर ले नारी चित्त ,

उत्सुक सरिता बह चले अर्णव से करने को मिलन !

विवश हो जिसके समक्ष नारी स्वयं कर दे समर्पण !

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जिस नर में हो धीरता ,उदारता व् वीरता ,

उसके प्रति नारी उर में पनप जाता है आकर्षण !

विवश हो जिसके समक्ष नारी स्वयं कर दे समर्पण !

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पुरुषों में उत्तम कहे जाते हैं श्री राम क्यूँ ?

नारी के सम्मान हेतु काट देते हैं दशानन !

विवश हो जिसके समक्ष नारी स्वयं कर दे समर्पण !

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कृष्णा की पुकार पर दौड़कर पधारते ,

पूर्ण-पुरुष कहलाते है इसीलिए राधेकृष्ण ,

विवश हो जिसके समक्ष नारी स्वयं कर दे समर्पण !



शिखा कौशिक 'नूतन '

बुधवार, 11 सितंबर 2013

वकीलों से सवाल

अगर गुनहगार का साथ देना भी गुनाह है तो गुनाह साबित हो जाने पर वकीलों को सजा देने का प्रावधान क्यों नहीं है, जो सबकुछ जानते हुए भी अपने मुवक्किल को बेगुनाह बताता है और गुनाह साबित हो जाने पर तरह तरह के बहाने बनाके सजा न देने की भीख माँगता है । अगर ये उनके प्रोफेशन का हिस्सा है तो ये कैसा प्रोफेशन है-चंद फीस के लिए गुनाह का साथ दो ?

क्या ज़मीर नाम की जो चीज़ होती है वो वकीलों के लिए नहीं है ? उनका दिल ये कैसे गवाही देता है कि सबकुछ जानते हुए भी वो अंतिम समय तक गुनहगार को बचाने का प्रयास करते रहते हैं ?

आप भी सोचे ? अपराध दिन ब दिन इतना बढ़ता क्यों जा रहा है क्योंकि कानून को लेके किसी के मन में कुछ भय नहीं है | सब सोचते हैं कि कुछ भी कर लो, अगर पकड़े गए तो पैसों के दम पे अच्छा से अच्छा वकील रख लो; वो कानून को तोड़-मरोड़ कर, झूठ को सही साबित करके बचा ही लेगा | अगर कुछ ऐसा प्रावधान हो जाए कि मुजरिम साबित हो जाने पर मुजरिम के साथ-साथ उसका केस लड़ रहे वकील को भी सजा मिलेगी तो डर से वकील जान कर गलत लोगों का केस लेना बंद कर देंगे और इस से अपराध करने वाले के मन में भी भय बैठ जाएगा और आधे से ज्यादा जुर्म ऐसे ही कम हो जाएंगे |


(संदर्भ-दिल्ली में गैंग रेप के आरोपियों का केस लड़ रहे वकील ने गुनाह साबित हो जाने के बाद भी मांग की है कि कम से कम सजा मिले)

आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी

आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी
आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी ,
सिसकियाँ भरते हुए रुक रुक के ये कहने लगी !
इन्सान  के दिल और दिमाग न रहे कब्जे में अब ,
मुझको निकाल  कर  वहां  हैवानियत  रहने  लगी  !!
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भूखी प्यासी मैं भटकती चीथड़ों  में रात दिन ,
पास बैठाते मुझे आने लगी है सबको घिन्न ,
मैं तड़पती और कराहती खुद पे शर्माने लगी !
आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी!!
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हैवानियत के ठाट हैं पीती शराफत का है  खून ,
वहशी इसको पूजते चारों दिशाओं  में है धूम ,
 बढ़ता रुतबा देखकर हैवानियत इतराने लगी !!
आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी!!
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 इंसानियत बोली थी ये क्रोध में जलते हुए ,
डूबकर मर जाऊं  या फंदा खुद कस लूँ गले ?
दरिंदगी के आगे बहकी नज़र आने लगी !!
आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी!!
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पोंछकर आंसू मैं उसके ये लगी फिर पूछने ,
तुम ही बतलाओ करूं क्या ?बात कैसे फिर बने ?
इंसानियत खोयी हुई हिम्मत को  जुटाने  लगी !
आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी!!
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है अगर दिल में जगह इंसानियत को दें पनाह ,
ये रहेगी दिल में तो हो सकता न कोई गुनाह ,
इंसानियत की बात ये 'नूतन' को लुभाने लगी !
आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी!!

शिखा कौशिक 'नूतन'