शनिवार, 7 जनवरी 2012

अदा तेरी क्या है......डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल ...

जलती शमा का ये कहना वज़ा है|
की परवाना खुद को समझता ही क्या है |       


यही  कह रहा है परवाना जलकर ,
जला जो नहीं उसका जीना भी क्या है |


जो जल जल के करते कठिन साधना-तप,
भला इससे बढ़कर के सज़दा ही क्या है |


यूं जल कर शमा पर शलभ पूछता है,
बताये की कोई खता मेरी क्या है |


पिघलती शमा कह  रही  है सभी से,
तिल तिल न पिघला वो जीवन ही क्या है |


तड़पता हुआ एक परवाना बोला,
मेरी प्रीति है ये अदा तेरी क्या है |


वो बुझती हुई शम्मा बोली चहक कर,
जिए ना मरे साथ जीना ही क्या है |


तभी पास बैठा  पियक्कड़ यूं बोला,
नहीं साथी कोई तो पीना भी क्या है |


यही प्रीति की रीति है श्याम' न्यारी,
नहीं प्रीति जीवन में जीना भी क्या है ||

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

बीवी और शौहर

बीवी और शौहर 




रात भर जागी  बीवी दर्द से जो तडपा शौहर ;
कभी बीवी के लिए क्यों नहीं जगता शौहर ?


करे जो काम बीवी फ़र्ज़ हैं उसको कहते ;
अपने हर एक काम को अहसान क्यों कहता शौहर ?


रहो हद में ये हुक्म देता बीवी को ;
मगर खुद पर कोई बंदिश नहीं रखता शौहर .


नहीं है हक़ बीवी को उठा के देख ले आँखें ;
जरा सी बात पर क्यों हाथ उठाता शौहर ?


शौहर के लिए दुनिया छोड़ देती बीवी ;
दुनिया के कहने पर उसी को छोड़ता शौहर .


                                    शिखा कौशिक 
                           [विख्यात ]





गुरुवार, 5 जनवरी 2012

यादों के झरोखे से---कविता ...डा श्याम गुप्त....

यादों के झरोखे से,
जब तुम मुस्कुराती हो ;
मन में इक नयी उमंग -नयी-
कान्ति बन कर आती हो |

उस साल तुम अपनी,
नानी के यहाँ आई थीं ,
सारे कैम्पस  में, एक -
नयी रोशनी सी लाई थीं |

वो घना  सा  रूप-
वो घनी केशराशि ;
हर बात में घने-घने -
कहने की अभिलाषी |

उसके बाग़ की बग़ीचों की,
फूलपत्ती और  नगीनों केी।
 हर चीज़ थी घनेरी-घनेरी,
जैसे आदत हो हसीनों केी ।

गर्मी  की  छुट्टी  में,
 मैं आऊंगी फ़िर ।
चलते चलते तुमने,
कहा था होके अधीर ।

अब न वो गर्मी आती है ,
न वैसी गर्मी  की छुट्टी ।
शायद करली है तुमने,
मेरे  से  पूरी कुट्टी ॥

बुधवार, 4 जनवरी 2012

दर्शन-प्राशन: सञ्जय दर्शन

दर्शन-प्राशन: सञ्जय दर्शन

नव वर्ष की मंगल कामनाएं ||
१२ वर्षों के विछोह की सुखद पीड़ा |
यादों की धरती को उर्वरा बनाता -
यह केंचुआ वह कीड़ा - -- ---

अब क्या करना है |




इत्मिनान से जी लूँ
लिख लूँ कुछ नगमें
जो ज़ज्बात से भरें हों
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |

गढ़ लूँ कुछ नये आयाम
सतत बढूँ दीर्घ गूंज से
ले मैं रुख पर नकाब
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |

स्मरण कर उन्मुक्त स्वर
स्वछन्द गगन में टहलूं
सहजभाव से स्मृतियों में
कुछ ख्यालों को छुला लूँ
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |

महसूस कर लूँ एहसास
तेरे यहाँ आने का
बरस जाये बरखा
सावन भर आये और
तुझसे मिलन हो जाएँ
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |
--- दीप्ति शर्मा


सोमवार, 2 जनवरी 2012

घर की इज़्ज़त वो भी है और मैं भी हूँ


मुहब्बत  में घायल वो भी है और मैं भी हूँ,
वस्ल के लिए पागल वो भी है और मैं भी हूँ,
तोड़ तो सकते हैं सारी बंदिशें ज़माने की,
लेकिन घर की इज़्ज़त वो भी है और मैं भी हूँ,

{वस्ल = मिलन}

"ब्लॉगर्स मीट वीकली
(24) Happy New Year 2012"
में आयें .
आपको यहाँ कुछ नया और हट कर मिलेगा .

रविवार, 1 जनवरी 2012

वैदिक सरस्वती वन्दना...डा श्याम गुप्त

 ------------------------सभी गुणी जनों को नव वर्ष की शुभ कामनाओं सहित.....
 

वेद ऋचा उपनिषद् ज्ञान रस ,     
का जो नर चिंतन करता है , 

करे अध्ययन मनन कर्म सब,
ऋषि प्रणीत जीवन सूत्रों का |
 

उस निर्मल मन बुद्धि भाव को,
जग जीवन की सत्व बुद्धि का|
स्वयं सरस्वती वर देतीं हैं,

सारे जीवन सार-तत्त्व का ||
 

माँ की कृपा भाव के इच्छुक,
जब माँ का आवाहन करते |
श्रेष्ठ कर्म रत,ज्ञान धर्म रत,

भक्तों को इच्छित वर मिलते।।
 

वाणी की सरगम ऋषियों ने,
सप्त वर्ण स्वर छंद निहित इस,
 
सत्य मूल ऊर्जा से, स्वयंभू-
अनहद नाद से किया संगठित॥
 

जग कल्याण हेतु माँ वाणी,
बनी 'बैखरी' हुई अवतरित
 

माँ सरस्वती कृपा करें , हों-
मन में नव भाव अवतरित।।


गूढ़ ज्ञान के तथ्यों को हम,

देख के भी तो समझ पाते।
 

ऋषियों द्वारा प्रकट सूत्र को,
सुनकर भी तो समझ पाते।
 

गूढ़ ज्ञान का तत्व केवल ,
बुद्धि की क्षमता से मिलता है  

करें साधना तप निर्मल मन ,
उस सुपात्र को ही मिलता है।।
 

मातु वाग्देवी सुपात्र को,
स्वतः ज्ञान से भर देतीं हैं।
देव, गुरू या किसी सूत्र से,
मन ज्योतिर्मय कर देती हैं
 

मेरे अन्धकार मय मन को ,
हे मां वाणी! जगमग करदो  

मां सरस्वती इस जड मति को,
शुद्ध ज्ञान से निर्मल करदो॥

श्रम, विचार कला-परक सब,

अर्थ-परक और ज्ञान-परक सब।

सारी ही विद्याएं  आकर,
सरस्वती में हुईं समाहित


सहज सुधा सम अमित रूप है,  

वाणी महिमा अपरम्पार
तुम अनन्त, स्त्रोत अनन्ता,
तुच्छ बुद्धि क्या पाये पार

सर्व ज्ञान सम्पन्न व्यक्ति भी,
सभी एक से कब होते हैं
अनुभव् तप श्रद्धा मन तो,

होते सबके अलग अलग हैं 

समतल होता भरा जलाशय,
 

यद्यपि ऊपर के जल-तल से
किन्तु धरातल गहराई के,
अलग अलग स्तर होते हैं॥


 ज्ञान रसातल अन्धकार में,
पड़े श्याम' को संबल देदो

मेरा भी स्तर उठ जाये,
 

हे मां ! एसा मति बल देदो
                                                                     ---चित्र गूगल साभार