यादों के झरोखे से,
जब तुम मुस्कुराती हो ;
मन में इक नयी उमंग -नयी-
कान्ति बन कर आती हो |
उस साल तुम अपनी,
नानी के यहाँ आई थीं ,
सारे कैम्पस में, एक -
नयी रोशनी सी लाई थीं |
वो घना सा रूप-
वो घनी केशराशि ;
हर बात में घने-घने -
कहने की अभिलाषी |
उसके बाग़ की बग़ीचों की,
फूलपत्ती और नगीनों केी।
हर चीज़ थी घनेरी-घनेरी,
जैसे आदत हो हसीनों केी ।
गर्मी की छुट्टी में,
मैं आऊंगी फ़िर ।
चलते चलते तुमने,
कहा था होके अधीर ।
अब न वो गर्मी आती है ,
न वैसी गर्मी की छुट्टी ।
शायद करली है तुमने,
मेरे से पूरी कुट्टी ॥
जब तुम मुस्कुराती हो ;
मन में इक नयी उमंग -नयी-
कान्ति बन कर आती हो |
उस साल तुम अपनी,
नानी के यहाँ आई थीं ,
सारे कैम्पस में, एक -
नयी रोशनी सी लाई थीं |
वो घना सा रूप-
वो घनी केशराशि ;
हर बात में घने-घने -
कहने की अभिलाषी |
उसके बाग़ की बग़ीचों की,
फूलपत्ती और नगीनों केी।
हर चीज़ थी घनेरी-घनेरी,
जैसे आदत हो हसीनों केी ।
गर्मी की छुट्टी में,
मैं आऊंगी फ़िर ।
चलते चलते तुमने,
कहा था होके अधीर ।
अब न वो गर्मी आती है ,
न वैसी गर्मी की छुट्टी ।
शायद करली है तुमने,
मेरे से पूरी कुट्टी ॥