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गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

''माँ' पूरी कायनात है !


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जो कलम लिख देती माँ ,
हो जाती वो तो पाक है ,
क्या लिखूं माँ के लिए ?
''माँ' पूरी कायनात है !
...................................
मैं हूँ क़तरा ; माँ समंदर ,
मैं कली वो है चमन ,
माँ के चरणों में है जन्नत ,
माँ ज़मी माँ ही गगन !
कामयाबी हर मेरी
''माँ'' का आशीर्वाद है !
क्या लिखूं माँ के लिए ?
''माँ' पूरी कायनात है !
................................
हम से पहले माँ ये जाने ,
क्या हमें कब चाहिए ?
माँ का दिल ममता भरा
और कुछ न पाइए ,
एक आह हमने भरी
माँ जागती दिन-रात है !
क्या लिखूं माँ के लिए ?
''माँ' पूरी कायनात है !
.........................................
हम हँसे तो माँ हंसी ,
रोने पर पुचकारती ,
डांट देती भूल पर ;
पल में फिर दुलारती !
माँ दुआ बनकर सदा
रहती हमारे साथ है !
क्या लिखूं माँ के लिए ?
''माँ' पूरी कायनात है !

शिखा कौशिक 'नूतन'

मंगलवार, 24 मार्च 2015

नहीं कोई भी माँ से बढ़कर दुनिया में ;


[google से sabhar ]
कभी आंसू नहीं मेरी आँख में आने देती ;
मुझे माँ में खुदा की खुदाई दिखती है .

लगी जो चोट मुझे आह उसकी निकली ;
मेरे इस जिस्म में रूह माँ की ही बसती है .

देखकर खौफ जरा सा भी  मेरी आँखों में ;
मेरी माँ मुझसे दो कदम आगे चलती है .

मेरे चेहरे से मेरे दिल का हाल पढ़ लेती ;
मुझे माँ कुदरत का  एक करिश्मा लगती है .

नहीं कोई भी  माँ से बढ़कर दुनिया में ;
इसीलिए तो माँ दिल पर  राज़ करती  है .

                        शिखा कौशिक  'नूतन '





शुक्रवार, 11 मई 2012

माँ ! वो पारस है !


माँ ! वो पारस है !


कभी माँ के थके पैरों को दबा कर देखो
ख़ुशी जन्नत की अपने दिल में तुम पा जाओगे .

जिसने देकर के थपकी सुलाया है तुम्हे
क्या उसे दर्द देकर चैन से सो पाओगे ?

करीब बैठकर माँ की नसीहतें भी सुनो
कई गुस्ताखियाँ करने से तुम बच जाओगे .

उसने हर फ़र्ज़ निभाया है बड़ी तबियत से
उसके हिस्से का क्या आराम तुम दे पाओगे ?

उम्रदराज़ हुई चल नहीं वो पाती है
उसे क्या छोड़ पीछे आगे तुम बढ जाओगे ?

जिसने कुर्बान करी अपनी हर ख़ुशी तुम पर
उसके होठों पे क्या मुस्कान सजा पाओगे ?

तुम्हे �े मिटटी से बनाती सोना
माँ ! वो पारस है उसे भूल कैसे पाओगे ?

शिखा कौशिक

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

इसीलिए तो माँ दिल पर राज़ करती है !




[google से sabhar ]
कभी आंसू नहीं मेरी आँख में आने देती ;
मुझे माँ में खुदा की खुदाई दिखती है .


लगी जो चोट मुझे आह उसकी निकली ;
मेरे इस जिस्म में रूह माँ की ही बसती है .


देखकर खौफ जरा सा भी  मेरी आँखों में ;
मेरी माँ मुझसे दो कदम आगे चलती है .


मेरे चेहरे से मेरे दिल का हाल पढ़ लेती ;
मुझे माँ कुदरत का  एक करिश्मा लगती है .


नहीं कोई भी  माँ से बढ़कर दुनिया में ;
इसीलिए तो माँ दिल पर  राज़ करती  है .


                        शिखा कौशिक  
                       [vikhyat ]