शोषण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शोषण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

मी टू----- डा श्याम गुप्त

मी टू-----
===========
------जबसे हिन्दुस्तान पर अंग्रेज़ी राज हुआ हम भारतीय अंग्रेजों के गुलाम हुए, गुलामी की आदत सी होगयी---अर्थात हर बात में उन्हीं की नक़ल ---- चाहे वह हिन्दी की बात हो, भारतीय संस्कृति की बात हो या कुछ और----
----अब जबसे अमेरिका की महिलायें 'मी टू' कह कर अपने स्वार्थवश , अपने लाभ के लिए किये गए पापों को, सारा सुख भोग लेने के बाद मुद्दतों बाद प्रसिद्द पुरुषों पर डालने में लगीं है ------हमारी भारतीय महिलायें भी --हम क्यों पीछे --के भाव नक़ल मारने में लगीं हैं|
\
---- प्रश्न है कि आखिर उसी समय ये महिलायें क्यों नहीं शोर मचातीं जब उनका शोषण किया जाता है --
----क्योंकि वे स्वयं लाभ की स्थिति में होती हैं , क्या आर्थिक, भौतिक, नौकरी का, धंधे का लाभ इतना महत्वपूर्ण है कि शोषण करवाते रहना आवश्यक है | यह स्वयं का स्वार्थ ही है ---महिलायें पहले तो स्वयं के स्वार्थ हेतु स्वयं को चारा बनाकर पेश करती हैं, जब मतलब निकल जाता है एवं उनका बाज़ार गिरने लगता है तो लाइम लाईट में आने के लिए आरोप लगाने लगती हैं |
\
----ऐसा कौन सा समाज, देश है जिसमें स्त्रियाँ ,महिमा मंडित पुरुषों के आगे-पीछे नहीं दौड़तीं, स्व-लाभ हेतु | हर युग में यह होता आया है परन्तु स्त्रियाँ व पुरुष अपने कृत्यों का बोझा ढोने से कतराते नहीं थे |
---- परन्तु आज यह नया चलन प्रारम्भ हुआ है , काम निकल जाने पर दोषारोपण का |
\
-----कब स्त्री इतनी, मजबूत, हिम्मतवर होगी कि किसी को अपना शोषण न करने दे चाहे कितना भी बड़ा लालच, स्वार्थ क्यों न हो | और 'मी टू' कहने, करने की आवश्यकता न रहे |

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ ....भाव अरपन ..दस -द्रौपदी की पतियाँ .. ....डा श्याम गुप्त....



            ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ .......डा श्याम गुप्त ...
              
                     मेरे शीघ्र प्रकाश्य  ब्रजभाषा काव्य संग्रह ..." ब्रज बांसुरी " ...की ब्रजभाषा में रचनाएँ  गीत, ग़ज़ल, पद, दोहे, घनाक्षरी, सवैया, श्याम -सवैया, पंचक सवैया, छप्पय, कुण्डलियाँ, अगीत, नवगीत आदि  मेरे अन्य ब्लॉग .." हिन्दी हिन्दू हिंदुस्तान " ( http://hindihindoohindustaan.blogspot.com ) पर क्रमिक रूप में प्रकाशित की जायंगी ... .... 
          कृति--- ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में विभिन्न काव्यविधाओं की रचनाओं का संग्रह )
         रचयिता ---डा श्याम गुप्त 
                       ---सुषमा गुप्ता 
प्रस्तुत है .....भाव अरपन ..दस ...द्रौपदी की पतियाँ .....


 




सुमन १-
हे धरमराज !
मैं बंधन में हती ,
समाज औ संस्कार के हित 
दिनरात खटति रही 
गेह-कारज हेतु,
परिवार पति पुरुष की सेवा में |
आजु मैं स्वतंत्र हूँ-
बड़ी कंपनी  की सेवा में नियुक्त हूँ ,
आपुनि इच्छा ते दिन रात खटति हूँ 
कंपनी के लें ,
अन्य पुरुषन  के संग या अधीन
कंपनी सेवा के हित में |


सुमन २.
हे भीम !
मैं बंधन में हती , परिवार के,
परवार के शोसन औ हिंसा के 
सिकार के हेतु|
आजु मैं मुक्त हूँ 
पाठसालाओं,  क्लब, बाजारनि  में ,
दफ्तर औ राजनीति की गलियन में -
शोषण, हिंसा और वलात्कार के लें |


सुमन-३ ..
हे बृहन्नला !
मैं बंधन में हती,
दिन राति खटति रही,
पति-पुरुष की गुलामी मैं |
अब मैं स्वाधीन हूँ,
सिनेमा, टीवी कलाकार हूँ,
दिना देखूं न रात 
हाड़ तोड़ श्रम करूं हूँ,
अंग प्रदर्शन हू,
पैसा -पुरुष की गुलामी में |


सुमन -४ 
हे नकुल !
मैं बंधन में हती,
धर्म, संसकृति, सुसंसकार की
धारक कौ चोला ओढि कें,
आजु मैं सुतंत्र हूँ -
लाजु औ हया के बसननि कौ
चोला छोडि कें |

सुमन-५..
हे सहदेव !
मैं बंधन में हती,
संस्कृति, संस्कार, सुरुचि के -
परिधान कंधा पै धारिकें |
अब मैं स्वाधीन हूँ,
हंसी-खुशी वस्त्र उतारि कें |


सुमन ६-..
माते कुंती !
तिहारी  बहू बंधन में हती,
बंटिकें -
माता, बिटिया ,पत्नी के रिस्तनि  में |
अब वो सुतंत्र है ,
बंटिवे के लें किश्तन में|


सुमन-७...
दुर्योधन!
ठगे रहि  गए हते, तुम, देखिकें -
'नारी बीच सारी है,
कि सारी बीच नारी है |'
आजु कलजुग में हू ,
सफल नहीं है पाओगे ...
सारी हीन नारी देखि-
ठगे रहि जाओगे |


सुमन-८ ..
सखा कन्हैया !
द्वापर में एक ही दुरजोधन हतो,
द्रोपदी की लाजु बचाय पाए |
आजु डगर-डगर, वन-बाग़, चौराहेनि पै,
दुरजोधन ठाड़े हैं ,
कौन-कौन कों सारी पहिराओगे ?
सोचूँ हूँ - अब की बेरि-
अवतार कौ जनमु लैकें न आऔ,
मानुष के मानस में ,
संस्कार बनिकें ,
उतरि जाऔ |