दष्ठौन, पार्टी !
कहा था आश्चर्य से
तुमने भी |
मैं जानता था पर-
मन ही मन,
तुम खुश थीं ;
हर्षिता, गर्विता |
अपनी छवि देखकर,
हम सभी प्रसन्न होते हैं ;
तो अपनी प्रतिकृति देखकर -
कौन हर्षित नहीं होगा |
’पुत्र जन्म पर यह सवाल-
क्यों नहीं किया था तुमने ”-
मैंने भी पूछ लिया था
अनायास ही |
इसका उत्तर-
लोगों के पास तो था ,
अनायास ही |
इसका उत्तर-
लोगों के पास तो था ,
सही या गलत -
पर नहीं था,
तुम्हारे पास ही |
प्रकृति-पुरुष,
विद्या-अविद्या ,
ईश्वर-माया,
शिव और शक्ति ;
युग्म होने पर ही -
पूर्ण होती है,
यह संसार रूपी प्रकृति |
अतः गृहस्थ रूपी संसार की ,
पूर्णाहुति में ही है,
यह पार्टी॥
प्रकृति-पुरुष,
विद्या-अविद्या ,
ईश्वर-माया,
शिव और शक्ति ;
युग्म होने पर ही -
पूर्ण होती है,
यह संसार रूपी प्रकृति |
अतः गृहस्थ रूपी संसार की ,
पूर्णाहुति में ही है,
यह पार्टी॥