गुरुवार, 14 नवंबर 2019

महिला आयोग - ध्यान दें मोदी व योगी

भारत में महिलाओं की मदद हेतु केंद्र और राज्य दोनों में महिला आयोग का गठन किया गया है जिनसे संपर्क करने के लिए 1091 व 181 हेल्पलाइन की व्यवस्था भी की गयी है. साथ ही, उत्तर प्रदेश में इस आयोग से संपर्क के नंबर 1800-180-5220 है. दोनों ही आयोगों के बारे में मुख्य जानकारी निम्नलिखित है - 

राष्ट्रीय महिला आयोग -
 राष्ट्रीय महिला आयोग (अँग्रेजी: National Commission for Women, NCW) भारतीय संसद द्वारा 1990 में पारित अधिनियम के तहत जनवरी 1992 में गठित एक सांविधिक निकाय है।यह एक ऐसी इकाई है जो शिकायत या स्वतः संज्ञान के आधार पर महिलाओं के संवैधानिक हितों और उनके लिए कानूनी सुरक्षा उपायों को लागू कराती है। आयोग की पहली प्रमुख सुश्री जयंती पटनायक थीं। 17 सितंबर, 2014 को ममता शर्मा का कार्यकाल पूरा होने के पश्चात ललिता कुमारमंगलम को आयोग का प्रमुख बनाया गया था,मगर पिछले साल सितंबर में पद छोड़ने के बाद रेखा शर्मा को कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर यह संभाल रही थी,और अब रेखा शर्मा को राष्ट्रीय महिला आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है।
राष्ट्रीय महिला आयोग का उद्देश्य -
 भारत में महिलाओं के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए और उनके मुद्दों और चिंताओं के लिए एक आवाज प्रदान करना है। आयोग ने अपने अभियान में प्रमुखता के साथ दहेज, राजनीति, धर्म और नौकरियों में महिलाओं के लिए प्रतिनिधित्व तथा श्रम के लिए महिलाओं के शोषण को शामिल किया है, साथ ही महिलाओं के खिलाफ पुलिस दमन और गाली-गलौज को भी गंभीरता से लिया है।
बलात्कार पीड़ित महिलाओं के राहत और पुनर्वास के लिए बनने वाले कानून में राष्ट्रीय महिला आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अप्रवासी भारतीय पतियों के जुल्मों और धोखे की शिकार या परित्यक्त महिलाओं को कानूनी सहारा देने के लिए आयोग की भूमिका भी अत्यंत सराहनीय रही है।
आयोग के कार्य -
1.आयोग के कार्यों में संविधान तथा अन्‍य कानूनों के अंतर्गत महिलाओं के लिए उपबंधित सुरक्षापायों की जांच और परीक्षा करना है। साथ ही उनके प्रभावकारी कार्यांवयन के उपायों पर सरकार को सिफारिश करना और संविधान तथा महिलाओं के प्रभावित करने वाले अन्‍य कानूनों के विद्यमान प्रावधानों की समीक्षा करना है।

2.इसके अलावा संशोधनों की सिफारिश करना तथा ऐसे कानूनों में किसी प्रकार की कमी, अपर्याप्‍तता, अथवा कमी को दूर करने के लिए उपचारात्‍मक उपाय करना है।

3.शिकायतों पर विचार करने के साथ-साथ महिलाओं के अधिकारों के वंचन से संबंधित मामलों में अपनी ओर से ध्‍यान देना तथा उचित प्राधिकारियों के साथ मुद्दे उठाना शामिल है।

4.भेदभाव और महिलाओं के प्रति अत्‍याचार के कारण उठने वाली विशिष्‍ट समस्‍याओं अथवा परिस्थितियों की सिफारिश करने के लिए अवरोधों की पहचान करना, महिलाओं के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए योजना बनाने की प्रक्रिया में भागीदारी और सलाह देना तथा उसमें की गई प्रगति का मूल्‍यांकन करना इनके प्रमुख कार्य हैं।

5.साथ ही कारागार, रिमांड गृहों जहां महिलाओं को अभिरक्षा में रखा जाता है, आदि का निरीक्षण करना और जहां कहीं आवश्‍यक हो उपचारात्‍मक कार्रवाई किए जाने की मांग करना इनके अधिकारों में शामिल है। आयोग को संविधान तथा अन्‍य कानूनों के तहत महिलाओं के रक्षोपायों से संबंधित मामलों की जांच करने के‍ लिए सिविल न्‍यायालय की शक्तियां प्रदान की गई हैं।
और उत्तर प्रदेश महिला आयोग -
प्रदेश में महिलाओं के उत्पीड़न सम्बन्धी शिकायतों के निस्तारण , विकास की प्रकिया में सरकार को सलाह देने तथा उनके सशक्तिकरण हेतु आवश्यक कदम उठाने के उद्देश्य को लेकर 2002 में महिला आयोग का गठन किया गया था। वर्ष 2004 में आयोग के कियाकलापों को कानूनी आधार प्रदान करने के लिए उ.प्र. राज्य महिला आयोग अधिनियम 2004 अस्तित्व में आया। तत्पश्चात पुन: जून 2007 में अधिनियम में कतिपय संशोधन कर आयोग का पुनर्गठन किया गया। पुन: दिनांक 26 अप्रैल 2013 को अधिनियम में आवश्यक संशोधन कर आयोग का पुनर्गठन किया गया।
आयोग का उद्देश्य-
महिलाओं के कल्याण, सुरक्षा, संरक्षण के अधिकारों की रक्षा करना ।
महिलाओं के शैक्षिक, आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिए निरंतर प्रयासरत रहना ।
महिलाओं को दिये गये संवैधानिक एवं विधिक अधिकारों से सम्बद्ध उपचारी उपायों के लिए अनुश्रवण के उपरान्त राज्य सरकार को सुझाव एवं संस्तुतियां प्रेषित करना ।
आयोग की शक्तियाँ-
आयोग को किसी वाद का विचारण करने के लिए सिविल न्यायालय को प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार जैसे :-
सम्मन करना ।
दस्तावेज मंगाना ।
लोक अभिलेख प्राप्त करना ।
साक्ष्यों और अभिलेखों के परीक्षण के लिए कमीशन जारी करना आदि ।
कार्यक्षेत्र-
आयोग को किसी वाद का विचारण करने के लिए सिविल न्यायालय को प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार जैसे :-
महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा ।
महिलाओं का सशक्तिकरण ।
महिला उत्पीडन सम्बंधी शिकायतों पर प्रभावी कार्यवाही करना ।
बाल विवाह, दहेज एवं भ्रूण हत्या रोकना ।
कार्य स्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीडन पर रोक ।
महिलाओं से सम्बंधित कानून में आवश्यकतानुसार संशोधन हेतु शासन को संस्तुतियां करना ।
महिलाओं से सम्बंधित योजनाओं का प्रभावी रूप से क्रियान्वयन करना ।
महिला कारागारों, चिकित्सालयों, छात्रावासों, संरक्षण गृहों तथा अन्य सदृश्य गृहों का निरीक्षण ।
        दोनों ही आयोगों के उद्देश्यों में महिलाओं की मदद करना शामिल किया गया है किन्तु अगर वास्तविक स्थिति का अवलोकन किया जाए तो परिणाम शून्य है क्योंकि महिलाओं की स्थिति आज क्या है वह केंद्र हो या यू पी, सभी जानते हैं और महिलाओं के द्वारा इन सेवाओं का उपयोग भी करने की कोशिश की जाती है किन्तु स्थानीय स्तर पर जितना मैं जानती हूं महिलाओं को अब तक एक बार भी इन आयोगों से कोई लाभ नहीं मिला है. ऐसे में यही कहा जा सकता है कि महिलाओं की गंभीर स्थिति को ध्यान में रखते हुए केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों की सरकारों को इस ओर ध्यान देना चाहिए.
शालिनी कौशिक एडवोकेट
(कानूनी ज्ञान)

बुधवार, 6 नवंबर 2019

Rural Indian women (ग्रामीण भारतीय नारी): India's most underrated population

प्रस्तावना
आज कल शहरो में फेमिनिज्म की आवाज बड़ी तेजी स्वर पकड़ रही है, सोशल मीडिया साइट्स पर मुहिमे चलायी जा रही है , महिलाएं खासकर युवा यानि हमारी हमउम्र ,महिलाओ के मुद्दों पर खुल कर सामने आ रही है फिर चाहे वह मुद्दा बीते दशक से उठ रहा समान वेतमान का हो या फिर मासिक धर्म और सेनेटरी पैड्स के उपयोग जैसे मुद्दा | जिसका उल्लेख भी आज से कुछ वर्ष पहले तक किया जाना अपवित्र माना जाता था  ।

गाँव की नारी ,सब पर भारी
यह तो हो गयी शहरों की बात अब बात करते है भारतीय समाज के उस तबके की जिसकी व्याख्या अंग्रेजी के शब्द "underated" से की जा सकती है वह है "ग्रामीण महिला" जिसका उल्लेख न तो रोज रोज अखबारों में होता है, न ही यह तबका टीवी पर खिड़कियों में बैठा बहस करता दिखेगा पर है तो यह भारतीय समाज का सबसे अहम तबका जो इस आधुनिकता के दौर में जहाँ पश्चिम की तरफ से चल रही हवा हमारे रहन सहन में मिलावट कर रही है उसी दौर में ग्रामीण महिलाएं आज भी नैतिकता और सरलता का झंडा उठाए झूझ रही है और जिस बराबरी के हक़ की आवाज को आज लोग फेमिनिज्म की उपमा दे रहे है यह महिलाएं सदियों पहले से उसके लिए संघर्षरत है,
स्त्रियों  को काम करने की आजादी देना जो आज के इस सोशल मीडिया के महिला शसक्तीकरण की सबसे बड़ी मांग है उसमे ग्रामीण महिलाएं शुरू से अग्रसर रही है ग्रामीण भारत के प्रमुख व्यवसाय कृषि में देखा जाये तो महिलाएं पुरुषों से कंधे से कन्धा मिलाये चल रही है और जब बात शिक्षा की आती है तो इस वक्त लड़कियों की शिक्षा दर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है और अगर राजनितिक क्षेत्र में देखा जाये तो ग्राम पंचायत में 50% आरक्षण ने महिलाओं को इस मोर्चे पर भी मजबूती प्रदान की है ।

शहरी और ग्रामीण महिला 
अब अगर तुलनात्म बात की जाये तो यह तो मानना पड़ेगा की भारत में दो अलग देश बसते है शहरीय भारत और ग्रामीण भारत जिनका लक्ष्य एक है पर जरूरते अलग अलग है और किसी भी मुद्दे पर विश्लेषण करने के लिए सिक्के के दोनों पहलु देखना जरूरी है | एक जगह जहाँ शहरीय इलाको में महिला शक्तिकरण बहुत आगे निकल गया है पर उसके साथ ही इसमें कही कही एक नकलीपन भी नजर आता है नशीले पदार्थो के सेवन ,पुरुषों के प्रति कट्टरपन भी आदि भी इसमें आ चुके है ,जिसका उदहारण हाल फिलहाल में बॉलीवुड में शुरू हुए एक सम्मानीय कदम #metoo है जो भी अंत में जाते जाते पब्लिसिटी के ढोंग की भेंट चढ़ गया और जो झूठे आरोपो की भीड़ में सच्चे खुलासों पर से भी लोगो का विश्वास उठ गया | वही दूसरी और ग्रामीण भारत में इसकी गति धीमी जरूर है पर वहाँ यह भोंडापन और नकलीपन नहीं है परन्तु समस्याएं यहाँ भी है रफ़्तार बहुत धीमी अपनी आवाज बुलंद करने में और समस्याएं कहने में हिचकिचाहट है कुछ और भी पहलू है जैसे जिन गांवों में महिला सरपंच है उनमे से ज्यादातर में ताकत आज भी सरपँच पति, पिता या परिवार के किसी पुरुष के पास है ।

सीधा लेखक के दिल से : 
बस यही था भारत में दो तरह के महिला शक्तिकरण पर छोटा सा लेख जितनी समझ है दोनों जगहों की उतना ही लिखा है ,
माना उम्र कम है , अनुभव ज्यादा नहीं है इसीलिए कुछ चीजो में परिपक्वता की कमी हो सकती है इसीलिए आपके सुझाव और स्वस्थ बहस के लिए आप सब कमेंट बॉक्स में आमंत्रित है
मेरी जिंदगी में दखल रखने वाली सभी महिलाओं को मेरा शत शत नमन 🙏
जय हिंद🙏

-आपका 
✍️शुभम जाट
  लेखक पर्सनल ब्लॉग : युवा भारत

बुधवार, 30 अक्टूबर 2019

मोदी के अभियान पर जैन महिला भारी

श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन की नई दिल्ली, राजपथ पर शुरूआत करते हुए कहा था कि “एक स्वच्छ भारत के द्वारा ही देश 2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर अपनी सर्वोत्तम श्रद्धांजलि दे सकते हैं।” 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत मिशन देश भर में व्यापक तौर पर राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में शुरू किया गया था। इस अभियान के अंतर्गत 2 अक्टूबर 2019 तक “स्वच्छ भारत” की परिकल्पना को साकार करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
स्वच्छता के जन अभियान की अगुआई करते हुए प्रधान मंत्री ने जनता को महात्मा गांधी के स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक वातावरण वाले भारत के निर्माण के सपने को साकार करने के लिए प्रेरित किया। श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं मंदिर मार्ग पुलिस थाने में स्वच्छता अभियान को शुरू किया। धूल-मिट्टी को साफ़ करने के लिए झाडू उठाकर स्वच्छ भारत अभियान को पूरे राष्ट्र के लिए एक जन-आंदोलन का रूप दिया और कहा कि लोगों को न तो स्वयं गंदगी फैलानी चाहिए और न ही किसी और को फैलाने देना चाहिए। उन्होंने “न गंदगी करेंगे, न करने देंगे।” का मंत्र भी दिया। श्री नरेन्द्र मोदी ने नौ लोगों को स्वच्छता अभियान में शामिल होने के लिए भी आमंत्रित किया और उनमें से हर एक से यह अनुरोध किया वो अन्य नौ लोगों को इस पहल में शामिल होने के लिए प्रेरित करें।

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लोगों को इस अभियान में शामिल होने का आह्वान करके स्वच्छता अभियान एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले चुका है। स्वच्छ भारत अभियान के संदेश ने लोगों के अंदर उत्तरदायित्व की एक अनुभूति जगा दी है और अब जबकि अधिकांश नागरिक पूरे देश में स्वच्छता के कामों में सक्रिय रूप से सम्मिलित हो रहे हैं, ऐसे में लगता ये था कि महात्मा गांधी द्वारा देखा गया ‘स्वच्छ भारत’ का सपना अब साकार होने लगा है किन्तु भारत जैसे देश में अगर देखा जाए तो " वादडिया सुजादडिया जप शरीरा नाल" अर्थात बचपन की लगी आदतें शरीर के साथ ही जाती हैं ऐसे में जगह-जगह कूड़ा फैलाने की भारतवासियों की ये आदत भी लगता नहीं कि जाएगी.
          4 जुलाई 2019 को हम दो बहनों द्वारा इसी अभियान के मद्देनजर अपने घर के पास के स्थान को सार्वजनिक कूड़ा स्थल के कलंक से मुक्ति दिलाने के लिए अभियान शुरू किया गया जिसमें हमें वर्तमान एस. डी. एम. श्री अमित पाल शर्मा जी व अधिशासी अधिकारी नगरपालिका परिषद् कांधला श्री राजबली यादव जी का पूर्ण रूप से सहयोग प्राप्त हुआ और इसी कारण हमने इस अभियान में क्षेत्र के सफाई कर्मचारी सतीश, राम किशन, सुषमा आदि के सहयोग से लगभग सफलता प्राप्त की, कमी अगर थी तो बस ये थी कि इसमें क्षेत्र के कथित अभिजात्य वर्ग का पूर्ण सहयोग नहीं मिल पा रहा था जिससे निबटने के लिए हमने नगरपालिका के सहयोग से एक बोर्ड लगाया जिसपर यह लिखा था कि
     यहां कूड़ा डालना मना है और कूड़ा डालने वाले का चालान काटा जाएगा - आज्ञा से अधिशासी अधिकारी नगरपालिका परिषद् कांधला
    किन्तु दुखद यह रहा कि बोर्ड लगने के बाद उसी शाम को घर के सामने के स्कूल नेशनल चिल्ड्रन एकेडमी द्वारा ही वहां बोर्ड के पास कूड़ा डाल दिया गया और बोर्ड लगना भी इसका कोई समाधान नज़र नहीं आया परिणाम स्वरूप दिन भर वहां खड़े रह कर कूड़ा डालने से रोकने की ड्यूटी जारी रही, सीसी टी वी कैमरे लगवाये कुछ फायदा हुआ पर पूरा नहीं, फिर दिमाग में आया कि लोगों की भगवान के प्रति आस्था को देखते हुए यहां मंदिर का निर्माण कराया जाए और करते करते 5 सितंबर 2019 को राम दरबार की स्थापना कराकर एक मंदिर की स्थापना भी करा दी गई
हम दोनों के साथ साथ हमारे बहुत से मिलने जुलने वालों का भी यही ख्याल था कि अब कोई भी व्यक्ति यहां कूड़ा नहीं डालेगा, 50 दिन करीब सब ठीक रहा पर फिर महिला सशक्तीकरण उभरकर सामने आया और सुबह 6 बजकर 11 मिनट पर एक जैन महिला द्वारा इस मिथक को तोड़ दिया गया 
और ये महिला वह थी जिसने हमारे अभियान का प्रति पल निरीक्षण किया था, पढ़ी-लिखी थी इसलिए बोर्ड भी पढ़ा था और जैन थी इसलिए हिन्दू धर्म के भगवान श्री राम को भी भली भांति जानती थी और यह भी नहीं कहा जा सकता कि वह प्रधानमंत्री स्वच्छता अभियान से नावाकिफ थी ऐसे में यह सोचना कि मोदी जी के द्वारा इस देश को गंदगी से निकालने का पुनीत अभियान सफल हो जाएगा, कोरी कल्पना ही है क्योंकि अपने घर का कूड़ा सब निकालना चाहते हैं लेकिन अपने दिमाग का कूड़ा चंद समझदार लोग ही, अधिकांश ऐसे ही हैं जो अपने घर से कूड़ा निकालकर दूसरे के घर के आगे चुपके से डाल कर निकल लेते हैं और स्वयं सफाई के ठेकेदार बने फिरते हैं. 
शालिनी कौशिक एडवोकेट 
(कौशल) 


गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

समाज महिलाओं की प्रतिभा को उचित सम्मान दे


समाज महिलाओं की प्रतिभा को उचित सम्मान दे

समय निरंतर बदलता रहता है, उसके साथ समाज भी बदलता है और सभ्यता भी विकसित होती है।लेकिन समय की इस यात्रा में अगर उस समाज की सोच नहीं बदलती तो वक्त ठहर सा जाता है। 
1901 में जब नोबल पुरस्कारों की शुरुआत होती है और 118 सालों बाद  2019 में जब  नोबल पुरस्कार विजेताओं के नामों की घोषणा होती है तो कहने को इस दौरान 118 सालों का लंबा समय बीत चुका होता है लेकिन महसूस कुछ ऐसा होता है कि जैसे वक्त थम सा गया हो।
क्योंकि 2019 इक्कीसवीं सदी का वो दौर है जब विश्व भर की महिलाएं डॉक्टर इंजीनियर प्रोफेसर पायलट वैज्ञानिक से लेकर हर क्षेत्र में अपना योगदान दे रही हैं।  यहाँ तक कि हाल ही के भारत के महत्वकांक्षी चंद्रयान 2 मिशन का नेतृत्व करने वाली टीम में दो महिला वैज्ञानिकों के अलावा पूरी टीम में लगभग 30% महिलाएं थीं। कमोबेश यही स्थिति विश्व के हर देश के उन विभिन्न चनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी महिलाओं के होने की है जो महिलाओं के लिए वर्जित से माने जाते थे जैसे खेल जगत,सेना, पुलिस, वकालत, रिसर्च आदि।
सालों के इस सफर में यद्यपि महिलाओं ने एक लंबा सफर तय कर लिया लेकिन 2019 में भी जब नोबल जैसे अन्य प्रतिष्ठित  पुरुस्कार पाने वालों के नाम सामने आते हैं  तो उस सूची को देखकर लगता है कि सालों का यह सफर केवल वक्त ने तय किया और महिला कहीं पीछे ही छूट गई। शायद इसलिए 2018 में पिछले 55 सालों में भौतिकी के लिए नोबल पाने वाली पहली महिला वैज्ञानिक डोना स्ट्रिकलैंड ने कहा था, "मुझे हैरानी नहीं है कि अपने विषय में नोबल पाने वाली 1901 से लेकर अब तक मैं तीसरी महिला हूँ, आखिर हम जिस दुनिया में रहते हैं वहाँ पुरूष ही पुरूष तो नज़र आते हैं।"  आश्चर्य नहीं कि  97% विज्ञान के नोबल पुरस्कार विजेता पुरूष वैज्ञानिक हैं। 1901 से 2018 के बीच भौतिक शास्त्र के लिए 112 बार नोबल पुरस्कार दिया गया जिसमें से सिर्फ तीन बार किसी महिला को नोबल मिला। इसी प्रकार रसायन शास्त्र, मेडिसीन, अर्थशास्त्र के क्षेत्र में भी लगभग यही असंतुलन दिखाई देता है। इनमें 688 बार नोबल दिया गया जिसमें से केवल 21 बार महिलाओं को मिला। अगर अबतक के कुल नोबल पुरस्कार विजेताओं की बात की जाए तो यह पुरस्कार विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान के लिए 892 लोगों को  दिया गया है जिसमें से 844 पुरूष हैं और 48 महिलाएं। विभिन्न वैश्विक मंचों पर जब लैंगिक समानता की बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं तो अंतरराष्ट्रीय स्तर के किसी पुरस्कार के ये आंकड़े निश्चित ही वर्तमान कथित आधुनिक समाज की कड़वी सच्चाई सामने ले आते हैं। इस विषय का विश्लेषण करते हुए ब्रिटिश साइंस जर्नलिस्ट एंजेला सैनी ने  "इन्फीरियर" अर्थात हीन नाम की एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में विभिन्न  वैज्ञानिकों के इंटरवियू हैं और कहा गया है कि वैज्ञानिक शोध खुद औरतों को कमतर मानते हैं जिनकी एक वजह यह है कि उन शोधों को करने वाले पुरूष ही होते हैं। अमेरिका की साइंस हिस्टोरियन मार्गरेट डब्लू रोसिटर ने 1993 में ऐसी सोच को माटिल्डा इफ़ेक्ट नाम दिया था जब महिला वैज्ञानिकों के प्रति एक तरह का पूर्वाग्रह होता है जिसमें उनकी उपलब्धियों को मान्यता देने के बजाए उनके काम का श्रेय उनके पुरुष सहकर्मियों को दे दिया जाता है  और आपको जानकर हैरानी होगी कि इसकी संभावना 95% होती है। क्लोडिया रैनकिन्स जो सोसाइटी ऑफ स्टेम वीमेन की  सह संस्थापक हैं, इस विषय में  उनका कहना है कि इतिहास में नेटी स्टीवेंस, मारीयन डायमंड और लिसे मीटनर जैसी कई महिला वैज्ञानिक हुई हैं जिनके काम का श्रेय उनके बजाए उनके पुरुष सहकर्मियों को दिया गया। दरअसल लिसे मीटनर ऑस्ट्रेलियाई महिला वैज्ञानिक थीं जिन्होंने न्यूक्लियर फिशन की खोज की थी लेकिन उनकी बजाए उनके पुरूष सहकर्मी ओटो हान को 1944 का नोबल मिला। 
 अगर आप  इस कथन के विरोध में नोबल पुरस्कार के शुरुआत यानी 1903 में ही मैडम क्यूरी को नोबल दिए जाने का तर्क प्रस्तुत करना चाहते हैं तो आपके लिए इस घटना के पीछे का सच जानना रोचक होगा जो अब इतिहास में दफन हो चुका है। यह तो सभी जानते हैं कि रेडिएशन की खोज मैडम क्यूरी और उनके पति पियरे क्यूरी दोनों ने मिलकर की थी लेकिन यह एक तथ्य है कि 1902 में जब  इस कार्य के लिए नामांकन दाखिल किया गया था तो नोबल कमिटी द्वारा मैडम क्यूरी को नामित नहीं किया गया था, सूची में केवल पियरे क्यूरी का ही नाम था । पियरे क्यूरी के एतराज और विरोध के कारण मैडम क्यूरी को भी नोबल पुरस्कार दिया गया और इस प्रकार 1903 में वो इस पुरस्कार को पाने वाली पहली महिला वैज्ञानिक और फिर 1911 में रेडियम की खोज करके दूसरी बार नोबल पाने वाली पहली महिला बनीं। 
स्पष्ट है कि प्रतिभा के बावजूद महिलाओं को  लगभग हर क्षेत्र में कमतर ही आंका जाता है और उन्हें काबलियत के बावजूद जल्दी आगे नहीं बढ़ने दिया जाता। 2018 की नोबल पुरस्कार विजेता डोना स्ट्रिकलैंड दुनिया के सामने इस बात का जीता जागता उदाहरण हैं जो अपनी काबलियत के बावजूद सालों से कनाडा की प्रतिष्ठित वाटरलू यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर ही कार्यरत रहीं थीं। इस पुरस्कार के बाद ही उन्हें प्रोफेसर पद की पदोन्नति दी गई। 
आप कह सकते हैं कि पुरूष प्रधान समाज में यह आम बात है। आप सही भी हो सकते हैं। किंतु मुद्दा कुछ और है। दरअसल यह आम बात तो हो सकती है लेकिन यह "साधारण"  बात नहीँ हो सकती। क्योंकि यहाँ हम किसी साधारण क्षेत्र के आम पुरुषों की बात नहीं कर रहे बल्कि विभिन्न क्षेत्रों के असाधारण वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, गणितज्ञ, साहित्यकार पुरुषों की बात कर रहे हैं जिनकी असाधारण बौद्धिक क्षमता  और जिनका मानसिक स्तर उन्हें आम पुरुषों से अलग करता है। लेकिन खेद का विषय यह है कि महिलाओं के प्रति इनकी मानसिकता उस भेद को मिटाकर इन कथित इंटेलेकचुअल पुरुषों को आम पुरुष की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है । पुरूष वर्ग की मानसिकता का अंदाजा ई -लाइफ जैसे साइंटिफिक जर्नल की इस रिपोर्ट से लगाया जा सकता है कि केवल 20% महिलाएं ही वैज्ञानिक जर्नल की संपादक, सीनियर स्कॉलर और लीड ऑथर जैसे पदों पर पहुंच पाती हैं। आप कह सकते हैं कि इन क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या और उपस्थिति पुरुषों की अपेक्षा कम होती है। इस विषय पर भी कोपेनहेगेन यूनिवर्सिटी की लिसोलेट जौफ्रेड ने एक रिसर्च की थी जिसमें उन्होंने यू एस नेशनल साइंस फाउंडेशन से इस क्षेत्र के 1901 से 2010 तक के जेंडर आधारित आंकड़े लिए और इस अनुपात की तुलना नोबल पुरस्कार पाने वालों की लिंगानुपात से की। नतीजे बेहद असमानता प्रकट कर रहे थे। क्योंकि जिस अनुपात में महिला वैज्ञानिक हैं उस अनुपात में उन्हें जो नोबल मिलने चाहिए वो नहीं मिलते।
जाहिर है इस प्रकार का भेदभाव आज के आधुनिक और तथाकथित सभ्य समाज की पोल खोल देता है।लेकिन अब महिलाएँ जागरूक हो रही हैं। वो वैज्ञानिक बनकर केवल विज्ञान को ही नहीं समझ रहीं वो इस पुरूष प्रधान समाज के मनोविज्ञान को भी समझ रही हैं। वो पायलट बनकर केवल आसमान में नहीं उड़ रहीं बल्कि अपने हिस्से के आसमाँ को मुट्ठी में कैद भी कर रही हैं। यह सच है कि अब तक स्त्री पुरूष के साथ कदम से कदम मिलाकर सदियों का  सफर तय कर यहाँ तक पहुंची है, इस सच्चाई को वो स्वीकार करती है और इस साथ के लिए पुरूष की सराहना भी करती है।  लेकिन अब पुरूष की बारी है कि वो स्त्री की काबलियत को उसकी प्रतिभा को स्वीकार करे और उसको यथोत्तचित सम्मान दे जिसकी वो हक़दार है। 

डॉ नीलम महेंद्र
लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं


शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

पति पे भारी - आज की नारी


दिखावा और औरतें आज के समय में एक दूसरे के पर्याय बने हुए हैं. थे तो पहले से ही, पर आज कुछ ज्यादा ही हो गए हैं और ऐसा नहीं है कि ऐसा मैं किसी व्यक्तिगत चिढ़ की वजह से कह रही हूँ बल्कि मैंने आज की औरतों को देखा है और महसूस किया है कि महज दिखावे के लिए ये अपनी सारी जिंदगी तबाह कर लेती हैं. 
अभी कल ही करवा चौथ का त्यौहार मनाया गया, त्यौहार कल था पर तैयारियां पिछले 10 दिनों से शुरू थी, ठीक मुसलमान औरतों की तरह, जैसे मुसलमान औरतें ईद के मौके पर घर के काम के समान, पहनने ओढ़ने के कपड़े, चप्पल, श्रंगार के समान आदि सभी कुछ खरीदने में पैसा जाया करती फिरती हैं जैसे घर में सब कुछ खत्म ही हो गया हो ठीक वैसे ही अब हिन्दू औरतें भी करवा चौथ पर चूड़ी श्रंगार की दुकानों पर ऐसे खड़ी रहती हैं जैसे अब तक तो इन चीजों के बगैर रह रही थी और इस सब का कारण केवल इतना है कि पडोस वाली ले रही है तो हम ही पीछे क्यूँ रहें भले ही पति की मेहनत की कमाई को ही लुटाना पड़ जाए. 
ऐसा ही करवा चौथ के व्रत के अनुष्ठान में हो रहा है, मम्मी जब करवा चौथ का व्रत करती थी तब वे बाजार से एक करवा मंगाती थी और करवा पानी से भरकर मंदिर में रखती थीं साथ ही एक लाल चूड़ी का डिब्बा मंगाती थी, दिन भर भूखी रहकर शाम को करवा चौथ व्रत की कथा हमें सुनाती थी और वह कहानी यह होती थी. करवा चौथ की कहानी के अनुसार - 
"सबसे प्रचलित कथा
एक ब्राह्मण के सात पुत्र थे और वीरावती नाम की इकलौती पुत्री थी। सात भाइयों की अकेली बहन होने के कारण वीरावती सभी भाइयों की लाडली थी और उसे सभी भाई जान से बढ़कर प्रेम करते थे. कुछ समय बाद वीरावती का विवाह किसी ब्राह्मण युवक से हो गया। विवाह के बाद वीरावती मायके आई और फिर उसने अपनी भाभियों के साथ करवाचौथ का व्रत रखा लेकिन शाम होते-होते वह भूख से व्याकुल हो उठी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। लेकिन चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।
वीरावती की ये हालत उसके भाइयों से देखी नहीं गई और फिर एक भाई ने पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा लगा की चांद निकल आया है। फिर एक भाई ने आकर वीरावती को कहा कि चांद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चांद को देखा और उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ गई।उसने जैसे ही पहला टुकड़ा मुंह में डाला है तो उसे छींक आ गई। दूसरा टुकड़ा डाला तो उसमें बाल निकल आया। इसके बाद उसने जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुंह में डालने की कोशिश की तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिल गया।
उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं। एक बार इंद्र देव की पत्नी इंद्राणी करवाचौथ के दिन धरती पर आईं और वीरावती उनके पास गई और अपने पति की रक्षा के लिए प्रार्थना की। देवी इंद्राणी ने वीरावती को पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से करवाचौथ का व्रत करने के लिए कहा। इस बार वीरावती पूरी श्रद्धा से करवाचौथ का व्रत रखा। उसकी श्रद्धा और भक्ति देख कर भगवान प्रसन्न हो गए और उन्होंनें वीरावती सदासुहागन का आशीर्वाद देते हुए उसके पति को जीवित कर दिया। इसके बाद से महिलाओं का करवाचौथ व्रत पर अटूट विश्वास होने लगा।"
कहानी सुनाने के बाद चांद निकलने का इंतजार करती थी और चांद निकलने पर करवे का जल चांद को चढाती थी और उसके बाद आकर अन्न जल ग्रहण करती थी. इस सारे अनुष्ठान में हमने तो कभी यह नहीं देखा कि मम्मी ने पहले चांद को फिर पापा को छलनी से देखा हो या पापा ने आकर मम्मी को जल पिलाकर मम्मी का व्रत खुलवाया हो और ये रिश्ता दोनों के बीच 41 साल तक रहा और उनके रिश्ते में सारी जिंदगी हमने कोई दरार भी नहीं देखी बस इतना है कि आदर्श मिसाल कायम करने वाले उनके इस रिश्ते में कोई दिखावा नहीं था जो कि आज के प्यार के दिखावे की नींव पर टिके आधुनिक औरतों के रिश्तों में मेकअप की परतों के रूप में बसा हुआ है. व्यस्तता की इस दुनिया में पति अपनी गाड़ी, मोटर साइकिल और साइकिल, जो भी रखते हैं पर अपना समय निकाल कर पत्नी को उसकी फालतू की ज़रूरत के लिए शहर के बाजार में इसलिए लिए फिरते हैं कि अगर घर का सुकून देखना है तो थोड़ा समय थोड़ा पैसा खर्च कर ही दो नहीं तो घरवाली तेरे लिए व्रत ही क्या रखेगी बल्कि तुझे ही भूखे पेट रहने को मज़बूर कर देगी. 
शालिनी कौशिक एडवोकेट 
(कौशल) 


रविवार, 13 अक्टूबर 2019

देह तक सिमटती आधुनिक नारी की सोच

सर्दियों का मौसम लगभग आरंभ हो गया है. सुबह और शाम को हल्की हल्की ठंड महसूस होने लगी है. रात को सोते समय पंखों का बंद होना भी शुरू हो गया है. सुबह के समय खेतों पर जाते हुए लोग गरम चादर ओढ़कर जाते हुए दिखने लगे हैं. मौसम परिवर्तन लोगों की वेषभूषा में बदलाव तो लाता ही है किन्तु जितना अधिक बदलाव पुरुषों की वेशभूषा में लाता है उतना महिलाओं की वेषभूषा में नहीं, आखिर क्यूं? ये प्रश्न विचारणीय है. 
सोनी टी वी पर आज कल एक विज्ञापन प्रचारित है जिसमें कैटरीना कैफ, रणबीर कपूर व आदित्य प्रतीक सिंह सिसौदिया उर्फ बादशाह ने काम किया है, बादशाह और रणबीर कपूर को देखकर लगता है कि सर्दी का मौसम बहुत जोरों पर है क्योंकि दोनों ही गरम भारी जैकेट पहने हुए हैं किन्तु तभी ध्यान जाता है कैटरीना कैफ पर, तो लगता है कि अभी तो सर्दी के मौसम की सोच भी दिमाग में लाना खुद पर जुल्म करना होगा क्योंकि कैटरीना साधारण गर्मी के वस्त्र पहने हुए हैं. 
न केवल कैटरीना बल्कि आजकल अगर हम अपने आस-पास भी नज़र दौड़ाते हैं तो ये महिला - पुरुष का भेदभाव हमारी नज़रों से अछूता नहीं रहेगा, एक तरफ मौसम के इस बदलाव में पुरुष जहां सफारी सूट, पूरी बाहों की शर्ट - पैंट में दिखाई दे रहे हैं वहीं महिलाओं की फ़ैशन के प्रति दीवानगी की सीमा की कोई हद ही नहीं है और ये दीवानगी ही कही जाएगी जिसमें महिलाओं के कपड़े की कटिंग बढ़ती ही जा रही है. 
आज शरद पूर्णिमा है, आज के दिन ही ठंड की ये दशा है कि सोते समय पंखा बंद करना पसंद आ रहा है और अब से लगभग एक माह बाद ये ठंड शायद अपने चरम पर पहुंच जाएगी ऐसा सोच सकते हैं किन्तु उफ्फ ये  फैशन पीड़ित महिलाएं, इनके लिए उससे सुहावना मौसम कोई होगा ही नहीं और ऐसे में उनके कपड़े मात्र तन ढकने का पर्याय बनकर रह जाएंगे. देवोत्थान एकादशी से शादियों का सीजन शुरू हो जाएगा और तब पुरुषों के लिए जहां गरम सूट भी ठंड रोकने के लिए कम पड़ेंगे वहीं नारियों के लिए गरम तो गरम ठंडे कपड़ों की भी कोई ज़रूरत नहीं रहेगी, अपना शरीर दिखाने के लिए ये फैशन पीड़ित नारियां शरीर पर से जितने कपड़े कम कर सकेंगीं, कम कर देंगी. 
महिलाएं इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य हैं, एक तरफ पुरुषों के द्वारा छेड़छाड़ से पीड़ित हैं तो दूसरी तरफ पुरुष इन पर ध्यान न दें तो भी पीड़ित हैं और इसीलिए आकर्षण का मुद्दा बनने के लिए इस तरह की हरकत करती हैं क्योंकि पुरुषों के अनुसार जो नारी ऐसा नहीं करती वह या तो आंटी है या बहनजी और इन फ़ैशन पीड़ित नारियों को अपने लिए ये सुनना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं इसलिए जहां एक तरफ स्कूटी चलाते वक़्त पूरी बाहों के दस्ताने पहन अपने हाथों को धूप से काले होने से बचाती हैं वहीं कंधों के काले होने का कोई डर नहीं क्योंकि वहां से आधुनिकता से जुड़ाव दिखाया जाता है और कंधों पर से आस्तीन को काट लिया जाता है. 
इसलिए अगर ये फ़ैशन पीड़ित नारियां ये कहें कि इस तरह के कपड़ों से छेडछाड या दुष्कर्म का कोई मतलब नहीं है तो यह बिल्कुल गलत होगा क्योंकि इन आधुनिक नारियों की यह विशेषता ही आज छेड़छाड़ या दुष्कर्म की मुख्य वजह कही जा सकती है क्योंकि ये अपनी इन हरकतों से ये पुरुषों में कामुकता को भड़का देती हैं जिसे शांत करने के लिए उन हवस पीड़ित पुरुषों को जो कोई भी मिल जाती है उसे वह अपना शिकार बना लेता है और ऐसे में उसका सबसे आसान शिकार छोटी बच्चियां ही होती हैं क्योंकि छोटी बच्चियां ना तो विरोध कर सकती हैं और न ही किसी को कुछ बता सकती हैं लेकिन ये फैशन पीड़ित नारियां न तो इस बात को कभी मानेंगी न ही इसके लिए अपने कपड़ों में कोई परिवर्तन ही अमल में लाएंगी क्योंकि ऐसा करते ही तो ये बैकवर्ड हो जाएंगी. 
शालिनी कौशिक एडवोकेट 
(कौशल)