रविवार, 24 सितंबर 2017

बेशर्म हैं वो लाठियां



डूब कर मरने की भी
बददुआ है बेअसर,
आंख का पानी भी जिनका
सूख गया इस कदर,
न्याय के लिए बढ़ी
बेटियों को क्या मिला?
ज्यादती की इंतिहां
हैं पुलिस की लाठियां!!!

हक नहीं गर बेटियों को
बोलने का देश में,
तानाशाही चल रही
जनतंत्र तेरे भेष में,
न रूकेगा बेटियों
जान लो ये सिलसिला,
ज्यादती की इंतिहां
है पुलिस की लाठियां!

बेशर्म है वो लाठियां
बेटियों पर जो पड़ी,
बेशर्म हैं वो हाथ जिनमें
लाठियां थी वे थमी,
अब ढ़हाना है हमें
बेशर्म ताकत का किला,
ज्यादती की इंतिहां
हैं पुलिस की लाठियां!!

शिखा कौशिक नूतन 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (26-09-2017) को रजाई ओढ़कर सोता, मगर ए सी चलाता है; चर्चामंच 2739 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'