शनिवार, 31 अगस्त 2013

समाज की बलि चढ़ती बेटियां



समाज की बलि चढ़ती बेटियां

'साहब !मैं तो अपनी बेटी को घर ले आता लेकिन यही सोचकर नहीं लाया कि समाज में मेरी हंसी उड़ेगी और उसका ही यह परिणाम हुआ कि आज मुझे बेटी की लाश को ले जाना पड़ रहा है .'' केवल राकेश ही नहीं बल्कि अधिकांश वे मामले दहेज़ हत्या के हैं उनमे यही स्थिति है दहेज़ के दानव पहले लड़की को प्रताड़ित करते हैं उसे अपने मायके से कुछ लाने को विवश करते हैं और ऐसे मे बहुत सी बार जब नाकामी की स्थिति आती है तब या तो लड़की की हत्या कर दी जाती है या वह स्वयं अपने को ससुराल व् मायके दोनों तरफ से बेसहारा समझ आत्महत्या कर लेती है .
सवाल ये है कि ऐसी स्थिति का सबसे बड़ा दोषी किसे ठहराया जाये ? ससुराल वालों को या मायके वालों को ....जहाँ एक तरफ मायके वालों को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता होती है वहां ससुराल वालों को ऐसी चिंता क्यूं नहीं होती ?
इस पर यदि हम साफ तौर पर ध्यान दें तो यहाँ ऐसी स्थिति का एक मात्र दोषी हमारा समाज है जो ''जिसकी लाठी उसकी भैंस '' का ही अनुसरण करता है और चूंकि लड़की वाले की स्थिति कमजोर मानी जाती है तो उसे ही दोषी ठहराने से बाज नहीं आता और दहेज़ हत्या करने के बाद भी उन्ही दोषियों की चौखट पर किसी और लड़की का रिश्ता लेकर पहुँच जाता है क्योंकि लड़कियां तो ''सीधी गाय'' हैं चाहे जिस खूंटे से बांध दो .
मुहं सीकर ,खून के आंसू पीकर ससुराल वालों की इच्छा पूरी करती रहें तो ठीक ,यदि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा दें तो यह समाज ही उसे कुलता करार देने से बाज नहीं आता .पति यदि अपनी पत्नी से दोस्तों को शराब देने को कहे और वह दे दे तो घर में रह ले और नहीं दे तो घर से बाहर खड़ी करने में देर नहीं लगाता  .पति की माँ बहनों से सामंजस्य बैठाने की जिम्मेदारी पत्नी की ,बैठाले तो ठीक चैन की वंशी बजा ले और नहीं बिठा पाए तो ताने ,चाटे सभी कुछ मिल सकते हैं उपहार में और परिणाम वही ढाक के तीन पात  रोज मर-मर के जी या एक बार में मर .
ये स्थिति तो तथाकथित आज के आधुनिक समाज की है किन्तु भारत में अभी भी ऐसे समाज हैं जहाँ बाल विवाह की प्रथा है और जिसमे यदि दुर्भाग्यवश वह बाल विधवा हो जाये तो इसी समाज में बहिष्कृत की जिंदगी गुजारती है ,सती प्रथा तो लार्ड विलियम बैंटिक के प्रयासों से समाप्त हो गयी किन्तु स्थिति नारी की  उसके बाद भी कोई बेहतर हुई हो ,कहा नहीं जा सकता .आज भी किसी स्त्री के पति के मरने पर उसका जेठ स्वयं शादी शुदा बच्चों का बाप होने पर भी उसे ''रुपया '' दे घरवाली बनाकर रख सकता है .ऐसी स्थिति पर न तो उसकी पत्नी ऐतराज कर सकती है और न ही भारतीय कानून ,जो की एक जीवित पत्नी के रहते हुए दूसरी पत्नी को मान्यता नहीं देता किन्तु यह समाज मान्यता देता है ऐसे रिश्ते को .
इस समाज में कहीं  से लेकर कहीं तक नारी के लिए साँस लेने के काबिल फिजा नहीं है क्योंकि यदि कहीं भी कोई नारी सफलता की ओर बढती है या चरम पर पहुँचती है तो ये ही कहा जाता है कि सामाजिक मान्यताओं व् बाधाओं को दरकिनार कर उसने यह सफलता हासिल की .क्यूं समाज में आज भी सही सोच नहीं है ?क्यूं सही का साथ देने का माद्दा नहीं है ?सभी कहते हैं आज सोच बदल रही है कहाँ बदल रही है ?जरा वे एक ही उदाहरण सामने दे दे जिसमे समाज के सहयोग से किसी लड़की की जिंदगी बची हो या उसने समाज के सहयोग से सफलता हासिल की हो .ये समाज ही है जहाँ तेजाब कांड पीड़ित लड़कियों के घर जाने मात्र से ये अपने कदम मात्र इस डर से रोक लेता हो कि कहीं अपराधियों की नज़र में हम न आ जाएँ ,कहीं उनके अगले शिकार हम न बन जाएँ और इस बात पर समाज अपने कदम न रोकता हो न शर्म महसूस करता हो कि अपराधियों की गिरफ़्तारी पर थाने जाकर प्रदर्शन द्वारा उन्हें छुडवाने की कोशिश की जाये .
इस समाज का ऐसा ही रूप देखकर कन्या भ्रूण हत्या को जायज़ ही ठहराया जा सकता है क्योंकि -
''क्या करेगी जन्म ले बेटी यहाँ ,
साँस लेने के काबिल फिजा नहीं .
इस अँधेरे को जो दूर कर सके ,
ऐसा एक भी रोशन दिया नहीं .''
शालिनी कौशिक
[एडवोकेट ]

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

कौन करेगा गर्व भला भारत की ऐसी नारी पर !!

कौन करेगा गर्व भला भारत की ऐसी नारी पर !!


नारी  मुझको  रोना  आता  तेरी इस लाचारी पर ,
कौन करेगा गर्व भला भारत की ऐसी नारी पर !!


कोख में कन्या-भ्रूण है सुनकर मिलता आदेश मिटाने का ,
विद्रोह नहीं क्यूँ तू करती ?क्यूँ ममता तेरी जाती मर !!
कौन करेगा गर्व भला भारत की ऐसी नारी पर !!


दुल्हन बनकर जो आती है वो भी तो तेरी बेटी सम  ,
जब आग में झोंकी जाती है क्यूँ नहीं रोकती तू बढ़कर !!
कौन करेगा गर्व भला भारत की ऐसी नारी पर !!


बेटा-बेटी में भेद बड़ा तू भी तो करने लगती है ,
बेटी को डांट पिलाकर के बेटा लेती बाँहों में भर !!
कौन करेगा गर्व भला भारत की ऐसी नारी पर !!


कर सकती है तो इतना कर ये सोच बदल दकियानूसी ,
दोनों फूलों से है उपवन बेटा-बेटी दोनों सुन्दर !
कौन करेगा गर्व भला भारत की ऐसी नारी पर !!

  शिखा कौशिक 'नूतन '




मंगलवार, 27 अगस्त 2013

श्री कृष्ण जन्म अष्टमी पर शुभकामनाएं |


श्री कृष्ण जन्म अष्टमी पर शुभकामनाएं | 

जसोदा तेरा लल्ला कितना सलोना है ,
पालने में झूलता चंदा सा खिलौना .

कान्हा को बाँहों का झूला झुलाएंगे ,
मीठी मीठी लोरी सुनाकर सुलायेंगें ,
ममता की बरखा से उसको भिगोना है .
जसोदा तेरा लल्ला ....

ले गोद  कान्हा को गोकुल घुमाएंगे ,
गैय्या दिखाएंगें उपवन घुमायेंगें ,
मखमल सा कोमल ये गोकुल का छौना है .
जसोदा तेरा लल्ला .....

कहते हैं सब ये जग का खिवैय्या है ,
हमारे लिए तो बस ये कन्हैय्या है ,
ये ही हमारा रत्न-धन-सोना है .
जसोदा तेरा लल्ला ....
                         शिखा कौशिक 'नूतन '
                    [भक्ति अर्णव ]

कब लब होंगे आज़ाद कब लेंगें खुलकर साँस ?




कब लब होंगे आज़ाद कब लेंगें खुलकर साँस ?
शोषित पीड़ित नारी ये सोच रही है आज !
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कब तक बनकर  सीता अग्नि परीक्षा देंगी ?
कब तक शुचिता -प्रमाणन की आज्ञा पूर्ण करेंगी ?
कब मूक कंठ से अपने भी निकलेगी आवाज़ ?
शोषित पीड़ित नारी ये सोच रही है आज !
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कब तक वस्तु की भाँति इसको दाँव लगाओगे ,
चीर -हरण करवाकर लज्जित करवाओगे ,
फूल सी देह के भीतर कब दिल होगा फौलाद !
शोषित पीड़ित नारी ये सोच रही है आज !
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कब तक बेटी के होने पर शोक मनाओगे ,
तुम दहेज़ की खातिर उसको आग लगाओगे ,
कभी तो  दुर्गा बनकर वो भी देगी गर्दन काट !
शोषित पीड़ित नारी ये सोच रही है आज !
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इंद्र छल का फल कब तक भोगे अहिल्या ,
दुष्यंत के धोखे में क्यों आती हैं शकुन्तला ,
कब भावों पर बुद्धि कर पायेगी राज !
शोषित पीड़ित नारी ये सोच रही है आज !
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चूड़ी ,बिंदी ,बिछुआ ,सिन्दूर के श्रृंगार ,
पति तो रुतबे वाली पति ही जीवन का आधार ,
कब पति करेंगें पत्नी -हित कोई उपवास !
शोषित पीड़ित नारी ये सोच रही है आज !

     शिखा कौशिक 'नूतन '

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

मानव तुम ना हुए सभ्य




आज भी कई
होते चीरहरण
कहाँ हो कृष्ण
                ***
रही चीखती
क्यों नहीं कोई आया
उसे बचाने
                ***
निर्ममता से
तार-तार इज्ज़त
करें वहशी
                ***
हुआ वहशी
खो दी इंसानियत
क्यों आदमी ने
                ***
तमाम भय
असुरक्षित हम
कैसा विकास
                ***
कैसी ये व्यथा
क्यों रहे जानवर
पढ़-लिख के
                ***
वामा होने की
कितनी ही दामिनी
भोगतीं सज़ा
                ***
बेबस नारी
अजीब-सा माहौल
कैसा मखौल
                ***
ओ रे मानव
कई युग बदले
हुआ ना सभ्य
                ***
Dr. Sarika Mukesh
http://hindihaiku.blogspot.com

बुधवार, 21 अगस्त 2013

श्याम स्मृति...स्त्री-शिक्षा व शोषण-चक्र ....डा श्याम गुप्त ...



                                      स्त्री-शिक्षा शोषण-चक्र ....
 
                              यदि शिक्षा स्त्री-शिक्षा के इतने प्रचार-प्रसार के पश्चात् भी शोषण उत्प्रीणन जारी रहे तो क्या लाभहमें  बातें नहींकर्म पर विश्वास करना चाहिए, परन्तु यथातथ्य विचारोपरांत   यह  

शोषण-उत्प्रीणन  चक्र अब रुकना ही चाहिए   पर जब तक  नारी स्वयं आगे नहीं आयेगी, क्या होगा, कुछ 

नहीं  ? नारी-शोषण   में कुछ नारियां ही तो भूमिका में होती हैं   आखिर हीरोइनों  को कौन  विवश करता है  

अर्धनग्न नृत्य के लिएचंद पैसे ही   क्या कमाई का यह ज़रिया वैश्यावृत्ति का नया अवतार नहीं कहा  

जा  सकता
 

               आखिर नारी क्या चाहती हैनारी स्वातंत्र्य का क्या अर्थ होमेरे विचार में स्त्री को भी पुरुषों  

की भाँति सभी कार्यों की छूट होनी चाहिए  हाँ, साथ ही सामाजिक मर्यादाएं, शास्त्र मर्यादाएं स्वयं स्त्री  

सुलभ मर्यादाओं की रक्षा करते हुए स्वतंत्र जीवन का उपभोग करें   आखिर पुरुष भी तो स्वतंत्र है, परन्तु  

शास्त्रीय, सामाजिक पुरुषोचि मर्यादा निभाये बगैर समाज उसे भी कब आदर देता है   वही स्त्री के लिए भी  
है  भारतीय समाज में प्राणी मात्र के लिए सभी स्वतन्त्रता सदा से ही हैं   हाँ, गलत लोग, गलत स्त्री तो हर  

समाज में सदा से होते आये हैं रहेंगे   इससे सामाजिक संरचना थोड़े ही बुरी होजाती है अतः उसे कोसा  

जाय , यह ठीक नहीं और  'समाज को बदल डालोयह नारा ही अनुचित है अपितु  'स्वयं को बदलो ' नारा  

होना चाहिए  यही एकमात्र उपाय है आपसी समन्वय का एवं स्त्री-पुरुष, समाज-राष्ट्र विश्व-मानवता की  

भलाई  उन्नति का |

रविवार, 18 अगस्त 2013

बेटी पराई -लघु कथा

Indian_bride : Series. young beautiful brunette in the indian national dress
बेटी पराई -लघु कथा 
वैदेही  के घर की चौखट पर कदम रखते ही सासू माँ चहक कर बोली -'' लो आ गयी बहू ....अब बना देगी चाय झटाझट  आपकी .''  वैदेही ने मुस्कुराकर सासू माँ की ओर देखा और पल्लू सिर पर ठीक करते हुए तेज कदमों से अपने बैडरूम की ओर बढ़ ली .पर्स एक ओर रखकर सैंडिल उतारी और किचन की ओर  चल दी .ससुर जी की चाय बनाते समय वैदेही को माँ की याद आ गयी .परीक्षा देकर लौटती  तो माँ कहती -''....अरे आ गयी वैदेही ..अच्छी परीक्षा हुई ...मेरी फूल सी बिटिया तो मुरझा ही गयी ...वैदेही मुंह हाथ धो ले मैं तेरे लिए तुलसी की चाय बनाकर लाती हूँ ''' .....पर यहाँ ससुराल में ये ठाट कहाँ ?ऑफिस जाते समय भी सब काम निपटा कर जाओ और लौटकर आते ही काम में जुट जाओ .पिछले महीने जब वंदना ननद जी एम्.ए. की परीक्षा देने  आई थी तब सासू माँ में भी माँ की छवि दिखाई दी थी ...ठीक माँ की तरह  ननद जी के लिए सासू माँ चाय बना लाती थी उनके परीक्षा देकर लौटते  ही ...पर बहू को चाय बनाकर देने में तो मानो नाक कट जाती है सास की .''  वैदेही के ये सब सोचते सोचते ही चाय में उबाल आ गया और वैदेही कप में छनकर ट्रे में कप-प्लेट रखकर ससुर जी के लिए चाय लेकर चली .ससुर जी को चाय पकड़ाकर वैदेही किचन की ओर लौट ही रही थी  कि सासू माँ ने अपने कमरे से आवाज़ लगा दी -'' बहू ...बहू वैदेही यहाँ आना !'' वैदेही के कदम उस ओर ही बढ़ चले .सासू माँ बैड पर कुछ जेवर लिए बैठी थी .वैदेही के वहां पहुँचते ही धीमी आवाज़ में बोली -'' वैदेही ...अब इस घर की मालकिन तू ही है .ये जेवर मेरी सास ने मुझे दिए थे ओर अब मैं तेरे हवाले इनको करके निश्चिन्त हो जाना चाहती हूँ .मेरे जीवन का कोई ठिकाना नहीं ओर हां इन जेवरों के बारे में भूलकर भी वंदना से जिक्र मत करना ..इस घर की बात दूसरे घर जाये ये ठीक नहीं ...मैंने वंदना के सामने कभी ये जेवर नहीं आने दिए ...बेटी तो  पराई होनी ही होती है ना .. यही  सोचकर छिपाया ,तुम भी ध्यान रखना '' वैदेही ने हाँ में गर्दन हिला दी और सोच में डूब गयी कि क्या मेरी माँ ने भी मुझसे ऐसी ही कई बातें छिपाई होंगी ?क्योंकि मुझे भी तो पराये घर ही आना  था !!!

शिखा कौशिक 'नूतन '