सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

भारतीय नारी ब्लॉग प्रतियोगिता -४ प्रविष्टि -१[रचनाकार -डा श्याम गुप्त ]

भारतीय नारी ब्लॉग प्रतियोगिता -४ प्रविष्टि -१
भारतीय नारी -----कविता ..मम्मी इमोशनल हो गयीं हैं;....

[रचनाकार -डा श्याम गुप्त ]
पुत्र-वधू का फोन आया
बोली, ’पापा ढोक’...
घर का फोन उठ नहीं रहा,
कहाँ व कैसे हैं आप लोग |

******************************

खुश रहो बेटी,
ठीक हैं हम भी,
ईश्वर की कृपा से मज़े में हैं, और-
इस समय तुम्हारे ‘कमरे’ में हैं |
क्या....!
हाँ बेटा हम अहमदाबाद में हैं, तथा-
तुम्हारे पापा के आतिथ्य में हैं |
हैं ...मम्मी कहाँ हैं पापा !
बैठी हैं तुम्हारे कमरे में- सजल नयन,
वो इमोशनल होगई हैं, और-
विचार कर रही हैं --
सिर्फ यही नहीं कि,
कैसे तुम यहाँ की डोर छोडकर
गयी हो वहाँ,
अज़नबी, अजान डगर,
अनजान लोगों के साथ,
हमारे पास ;
अपितु---साथ ही साथ,
अपने अतीत की यादों के डेरे में...कि—
कभी वह स्वयं भी
अपना घर, कमरा, शहर
छोडकर आई थी ; और---
तुम्हारी ननद भी-
गयी है ,छोडकर ...
अपना घर, कमरा, कुर्सी, मेज़...
इसी तरह.........||

सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

जरूर पढ़िए

मैंने ट्विटर पर यह पढ़ा .आवश्यक लगा यहाँ साझा करना .आप भी साझा करें -
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शिखा कौशिक 'नूतन'

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

क्या आप भारत-योगी जी से सहमत हैं ?

भारत योगी जी ने अपनी एक पोस्ट में ये विचार प्रस्तुत किये हैं .क्या आप सहमत हैं ? यदि हाँ तो क्यों ?यदि ना तो क्यों ?

● इन्हें आजादी चाहिए कम कपड़े पहनने दो.

PLEASE READ FULL  POST HERE -http://www.bharatyogi.net/2013/10/freedom.html

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

शक्ति पूजा


नवरात्री शुरू होने वाली हैं सीमा घर की साफ़ सफाई में लगी है। कल शक्ति स्वरूपा  देवी जी की स्थापना का दिन है उनके स्वागत में वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। 
बचपन से सुनती आयी है नारी ही शक्ति है जो सृष्टि के निर्माण की सामर्थ्य रखती है। शक्ति की उपासना के द्वारा नारी शक्ति को शशक्त किया जाता है जिससे विश्व निर्माण और सञ्चालन सुचारू रूप से चल सके।  
फोन की घंटी ने उसके हाथों और दिमाग की गति को रोक दिया।  बाहर उसके ससुर जी फोन सुन रहे थे घर में अचानक जैसे सन्नाटा पसर गया।  उसके ससुर जी बहुत धीमी आवाज़ में कह रहे थे " बेटी तू ही बता मैं और पैसा कहाँ से लाऊँ ? पहले ही दस लाख रुपये दामाद जी को दे चूका हूँ ,रिटायर आदमी हूँ ,तेरे भाई की तनख्वाह से उसके खर्चे ही जैसे तैसे पूरे हो पाते हैं। तू दामाद जी को समझा न अगर दे सकता तो जरूर दे देता बेटी। " 
फोन रख कर ससुरजी निढाल से पलंग पर बैठ गए और दोनों हाथों से माथा थाम लिया।  "क्या करूँ कहाँ फेंक दिया मैंने अपनी बेटी को ,जानती हो सुनील की माँ आज तो वो रो रो कर कह रही थी ,पापा मुझे यहाँ से ले जाओ आप इनका पेट कभी नहीं भर सकोगे ,मुझे जिन्दा देखना चाहते हो तो यहाँ से ले जाओ। "
उसे ले भी आऊं लेकिन इतनी बड़ी जिंदगी अकेले कैसे और किसके भरोसे काटेगी ? हम कब तक बैठे रहेंगे ? " 
सीमा चुपचाप अपने काम में लग गयी। देवी स्थापना का दूसरे दिन दोपहर का मुहूर्त था । सीमा सुबह ही बाज़ार जाने का कह कर घर से निकल गयी।  
मुहूर्त का समय निकला जा रहा था सीमा का कहीं अता पता नहीं था। घर की बहू के बिना शक्ति पूजा कैसे हो ? तभी घर के सामने ऑटो आ कर रुका और उसमे से सीमा के साथ उतरी उसकी ननद।  सब अवाक उसे देखने लगे , ननद दौड़ कर अपनी माँ के गले लग कर फूट फूट कर रो पड़ी। सबकी प्रश्न वाचक दृष्टी सीमा की ओर उठ गयीं।  
माँ जी नारी ही शक्ति स्वरूप है और शक्ति सबके साथ से मिलती है हम शक्ति पूजा के इस मौके पर घर की बेटी को कैसे अकेला छोड़ सकते हैं ? आज से हम सब उसके साथ रहेंगे और अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे। यही देवी की सच्ची उपासना होगी।  
माँ जी ने सीमा को गले लगा लिया।  
kavita verma 

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

जीवन: एक संघर्ष (LiFe :A StRuGgLe) : दास्तां-ए-सिगरेट by श्रवण शुक्ल

जीवन: एक संघर्ष (LiFe :A StRuGgLe) : दास्तां-ए-सिगरेट by श्रवण शुक्ल: ((C) Copyright   @  श्रवण शुक्ल

सिगरेट की दास्तां है अजीब! 
डिब्बी से निकली
माचिस की तिल्ली के साथ होंठों पर
फिर खत्म होते ही पैरों तले!

क्या अजीब है 
दास्तां-ए-सिगरेट!
जलते हुए फेफड़ों में
फिर दिल तक पहुंचता है
वही जो शरीर का कर्ता-धर्ता है
फिर आगे का तो है ही पता..!!

दिल से हवा में.
फिर होंठे से फेफड़े 
और फिर दिल तक!

कई दफे
यह दुष्चक्र
फिर दूसरी या चौथी बार में
फेफड़ों से दिल और फिर मष्तिष्क!..........  for more please log on to जीवन: एक संघर्ष (LiFe :A StRuGgLe) : दास्तां-ए-सिगरेट by श्रवण शुक्ल: ((C) Copyright   @  श्रवण शुक्ल) 

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

रक्षा-बंधन का उपहार -लघु कथा


रक्षा बंधन के पावन पर्व पर किशोरी रक्षिता ने अपने बड़े भाई राघव की कलाई पर राखी बांधी और तिलक लगाकर आरती उतारी .मम्मी-पापा के साथ -साथ रक्षिता भी प्रतीक्षा करने लगी कि आज भैया क्या उपहार देंगें पर राघव ने अपनी कलाई पर बांधी गयी राखी को दुसरे हाथ की उँगलियों से हल्के से छूते हुए कहा -'' रक्षिता हर वर्ष मैं तुम्हे महंगें उपहार देता हूँ इस मौके पर.. ..जो साल भर में पुराने हो जाते हैं पर आज मैं तुम्हें तीन वचन उपहार के रूप में दूंगा जो कभी पुराने नहीं होंगे .मैं पहला वचन देता हूँ -''सड़क पर ,बस में , ट्रेन में कहीं भी किसी महिला के साथ छेड़छाड़ को अनदेखा नहीं करूंगा ''......मैं दूसरा वचन देता हूँ -'' मैं अपने विवाह में दहेज़ नहीं लूँगा ''....मैं तीसरा वचन देता हूँ -'' मैं कन्या भ्रूण हत्या नहीं करूंगा और अन्य लोगों को भी यह पाप करने से रूकूंगा !....रक्षिता यदि मैं इन वचनों का दृढ़ता से पालन कर पाया तभी तेरी बांधी गयी हर राखी का क़र्ज़ चूका पाऊंगा .'' रक्षिता ने नम आँखों से राघव की ओर देखते हुए कहा -'' भैया आज आपने नारी जाति के प्रति जो सम्मान भाव से युक्त ये वचन निभाने का निश्चय किया है उससे बढ़कर उपहार कोई भी भाई अपनी बहन को नहीं दे सकता .'' दोनों युवा होते बच्चों की सुन्दर बातें सुनकर रक्षिता व् राघव के मम्मी-पापा की आँखें भी ख़ुशी से भर आई .



शिखा कौशिक 'नूतन'

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

तेरी तो हर बात ग़ज़ल... ग़ज़ल ...डा श्याम गुप्त .....

तेरे दिन और रात ग़ज़ल,
तेरी तो हर बात ग़ज़ल |

प्रेम-प्रीति  की रीति ग़ज़ल,
मुलाक़ात की बात ग़ज़ल |

मेरे यदि नग्मात ग़ज़ल,
तेरी हर आवाज़ ग़ज़ल |

तेरे दर का फूल ग़ज़ल,
पात पात हर पात ग़ज़ल |

हमें भुलादो बने ग़ज़ल,
यादों की बरात ग़ज़ल |

तू हंसदे होजाय  ग़ज़ल,
अश्क अश्क हर अश्क ग़ज़ल |

तेरी शह की बात ग़ज़ल,
मुझको तेरी मात ग़ज़ल |

तू हारे तो क़यामत हो,
तेरी जीत की बात ग़ज़ल |

हंस देख कर शरमाये,
चाल तेरी क्या बात ग़ज़ल |

मेरी बात पे मुस्काना,
तेरे ये ज़ज्बात ग़ज़ल |

इठलाकर लट खुल जाना ,
तेरा  हर अंदाज़ ग़ज़ल |

तेरी ग़ज़लों पर मरते ,
कैसी सुन्दर घात ग़ज़ल |

श्याम' सुहानी ग़ज़लों पर ,
तुझको देती दाद ग़ज़ल ||